भगवान गणेश प्रथम पूज्य क्यों

    अक्सर लोगों को इस बात की जिज्ञासा मन में रहती है की सृष्टि की रचना से लेकर उसका संचालन और उसके अंत का जिम्मा तीन देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास है तो हर पूजा और शुभ काम में भगवान गणपति की पूजा सबसे पहले क्यों होती है.

    दरअसल बहुत समय पहले की बात है। एक पवित्र स्थान था — नैमिषारण्य। वहाँ अनेक ऋषि-मुनि एक साथ बैठे थे। सभी ध्यान और साधना में लीन थे। एक दिन उनके मन में विचार आया — “ऐसी कौन-सी कथा है, जिसे सुनने से मन पवित्र हो जाए, दुःख दूर हों और जीवन में ज्ञान की वृद्धि हो?” तभी सभी ऋषि सूतजी महाराज के पास पहुँचे और विनम्र होकर बोले —

    “हे सूतजी! कृपा कर हमें भगवान गणेश की महिमा सुनाइए।”

    सूतजी मुस्कुराए और बोले — “मुनिवरो, गणेश वही देव हैं जिनका नाम लिए बिना कोई काम पूरा नहीं होता। वे ही विघ्नों को मिटाने वाले और बुद्धि देने वाले भगवान हैं। अब मैं आपको बताता हूँ कि उन्हें प्रथम पूज्य क्यों कहा गया।”

    प्रथम पूज्य होने की कथा

    एक बार देवताओं में विवाद हुआ — सब यह सोचने लगे कि पहले पूजा किसकी होनी चाहिए? तब भगवान शिवजी ने कहा — “जो पहले पूरे संसार की परिक्रमा कर आएगा, उसी की पूजा सबसे पहले की जाएगी।”

    सभी देवता अपने-अपने वाहनों पर बैठकर निकल पड़े। कोई गरुड़ पर सवार हुआ, कोई मोर पर, कोई सिंह पर। लेकिन गणेशजी का वाहन तो छोटा-सा मूषक (चूहा) था। वे मुस्कुराए और बोले — “जब मेरे माता-पिता — शिव और पार्वती ही पूरे जगत के स्वरूप हैं, तो उनकी परिक्रमा ही पूरे संसार की परिक्रमा के समान होगी।” गणेशजी ने अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा की और श्रद्धा से प्रणाम किया।

    जब बाकी देवता लौटे, तो उन्होंने देखा कि गणेशजी पहले से ही विराजमान हैं। शिवजी प्रसन्न होकर बोले — “वत्स गणेश! तुम्हारी बुद्धि सबसे श्रेष्ठ है। आज से तुम सब देवताओं में प्रथम पूज्य कहलाओगे। हर शुभ कार्य की शुरुआत तुम्हारे नाम से ही होगी।” इसी कारण, आज भी हर मंगल कार्य “श्री गणेशाय नमः” या “गणपति बप्पा मोरया” कहकर ही शुरू किया जाता है।

    राजा सोमकान्त की कथा

    एक बार राजा सोमकान्त को भयंकर कुष्ठ रोग हो गया। वे अत्यंत दुखी होकर भृगु मुनि के आश्रम पहुँचे। भृगु मुनि ने ध्यान लगाया और कहा — “राजन, यह रोग तुम्हारे पिछले जन्म के कर्मों का फल है। पिछले जन्म में तुम कामद नामक वैश्य थे। तुमने एक सुंदर गणेश मंदिर बनवाया था, पर अहंकार में एक ब्राह्मण का अपमान कर दिया था। अब वही पाप तुम्हें कष्ट दे रहा है।”

    राजा ने विनम्र होकर पूछा — “हे मुनिवर! अब मैं इस पाप से कैसे मुक्त हो सकता हूँ?”

    भृगु मुनि बोले —

    “यदि तुम श्रद्धा और भक्ति से गणेश पुराण का पाठ और श्रवण करोगे,

    तो तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएँगे।”

    राजा ने बड़ी श्रद्धा से गणेश पुराण की कथा सुनी। कथा समाप्त होते ही उसके शरीर से एक काला पाप पुरुष निकलकर जल में डूब गया। राजा स्वस्थ हो गया और उसका शरीर तेजस्वी बन गया।

    तब मुनि बोले — “कलियुग में जो व्यक्ति गणेश पुराण का श्रवण करेगा, उसके सारे दुःख और पाप नष्ट हो जाएँगे।”

    वेदव्यास और गणेशजी की कथा

    एक बार वेदव्यासजी ने वेदों का विभाजन पूरा किया और पुराण लिखने का निश्चय किया। उन्होंने बिना गणेशजी की वंदना किए लेखन आरंभ किया, पर उनका मन विचलित हो गया, और लेखन आगे नहीं बढ़ा।

    तभी ब्रह्माजी प्रकट हुए और बोले — “व्यास, गणेशजी का स्मरण किए बिना कोई भी कार्य सफल नहीं होता। गणेश ही ब्रह्म हैं। उनका बीज मंत्र ‘गं’ है। वो ही ज्ञान और बुद्धि के सागर हैं।” व्यासजी ने ब्रह्माजी की आज्ञा मानी, गणेशजी की पूजा की और उनकी कृपा से उन्होंने महाभारत और पुराणों की रचना पूर्ण की।

    प्रलय के समय गणेशजी

    प्रलय के समय जब पूरा ब्रह्मांड नष्ट हो गया, तब केवल भगवान गणेश ही शेष रहे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश — तीनों ने उनका ध्यान किया। गणेशजी प्रकट हुए और बोले — “अब सृष्टि की रचना का समय है।” उन्होंने ब्रह्मा को सृजन का कार्य, विष्णु को पालन का कार्य, और शिव को संहार का कार्य सौंपा। इसी कारण गणेश पुराण में कहा गया है — “गणेश ही सबके मूल हैं। उनसे ही सृष्टि का आरंभ और अंत होता है।”

    उपसंहार

    इसलिए भगवान गणेश को प्रथम पूज्य कहा गया है। वे बुद्धि, शांति और भक्ति के प्रतीक हैं। जहाँ उनका नाम लिया जाता है, वहाँ से सारे विघ्न और दुःख दूर हो जाते हैं। हर दिन गणेश जी का यह पवित्र मंत्र जपें —

    वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।

    निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

    इस मंत्र का जाप करने से बुद्धि, सफलता और शांति मिलती है।

    गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया!

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