Drishya Dharma
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सम्पूर्ण स्वास्थ्य की नींव है दांतों की सफाई
सनातन दिनचर्या में दांतों की स्वच्छता पर विशेष बल दिया जाता है. क्योंकि व्यक्ति की मुस्कान तभी उज्ज्वल और हृदयस्पर्शी बनती है, जब उसका मुख स्वच्छ, शुद्ध और निरोगी हो।
आयुर्वेद के अनुसार मुख शरीर का द्वार है। जैसे घर का द्वार साफ-सुथरा हो तो भीतर आने वाला भी आनंदित होता है, वैसे ही शरीर का यह द्वार जब स्वच्छ रहता है, तो भीतरी स्वास्थ्य और बाहर के आत्मविश्वास, दोनों का संचार होता है। यही कारण है कि प्रातःकाल शौच क्रिया के बाद पहला कार्य दाँत और मुख की शुद्धि को माना गया है।
“आज के समय में ज़्यादातर लोग टूथब्रश और पेस्ट का प्रयोग करते हैं। यह सुविधाजनक भी है। परंतु प्राचीन परंपरा में दातुन का विधान था। नीम, बबूल या करंज जैसी दातुन। क्यों? क्योंकि इन वृक्षों की दातुन में केवल दांतों को साफ करने की क्षमता ही नहीं, बल्कि रोगों को दूर करने की शक्ति भी है। नीम की दातुन दाँतों को कीटाणुओं से मुक्त करती है, बबूल की दातुन मसूड़ों को मजबूत बनाती है और करंज की दातुन मुख को दुर्गंध से बचाती है। मतलब दातुन केवल सफाई का साधन नहीं, बल्कि औषधि का काम भी करती है।” आप रोज तो दातुन कर नहीं सकते मगर नीम, बबूल और करंज से बनी टूथ पेस्टों का इस्तेमाल करें लाभ रहेगा. और हाँ सप्ताह या महीने में कोशिश करें की एक या दो दिन दातुन से भी दाँत साफ करें.
आयुर्वेद कहता है कि हर दिन एक जैसा नहीं होता। कुछ दिन—जैसे रविवार, एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, व्रत और श्राद्ध के दिन—विशेष माने गए हैं। इसलिए इन दिनों दातुन करना निषेद माना गया है।
ऐसे समय में हमें केवल शुद्ध मंजन या गरम पानी से ही दाँत साफ करने चाहिए।
इस नियम का भाव बड़ा सरल है—कि शरीर और मन दोनों को भी थोड़ा विश्राम चाहिए।
जैसे प्रकृति अपने स्वाभाविक क्रम से चलती है, वैसे ही हम भी इन खास दिनों में साधारण तरीके से जीवन जीएँ।
इसे एक प्रकार का संयम और साधना माना गया है।
यह हमें सिखाता है कि स्वच्छता केवल सफाई का काम नहीं, बल्कि जीवन में लय और संतुलन बनाने का अभ्यास भी है।”
“दन्तधावन के बाद आयुर्वेद जीभी-निर्लेखन अर्थात जीभ की सफाई के बारे में भी बताता है।
क्योंकि जीभ पर जमा मैल केवल स्वाद को ही नहीं बिगाड़ता , बल्कि पूरे पाचनतंत्र पर विपरीत प्रभाव डालता है।
कहा जाता है—‘स्वच्छ जीभ, स्वच्छ पाचन’।
सुबह जीभ को स्वच्छ करने से न केवल स्वादेंद्रिय जागृत होती है, बल्कि वाणी भी मधुर और स्पष्ट होती है। और एक स्वच्छ जीभ से निकले शब्द भी उतने ही निर्मल और प्रभावशाली होंगे।”
कहा जाता है कि आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत के शिष्य ने एक बार उनसे पूछा—
‘गुरुदेव, क्या केवल दातुन से ही दांत निरोगी रहते हैं?’ सुश्रुत मुस्कुराए और बोले—
‘नहीं पुत्र, दातुन साधन है, परंतु साध्य है नियमितता। यदि आप प्रतिदिन मुख-शुद्धि करोगे, संयमित आहार करोगे और मिठाई के बाद मुख को जल से धोएंगे , तो दाँत जीवन भर मजबूत बने रहेंगे।’
यह प्रसंग हमें बताता है कि केवल साधन बदलने से नहीं, बल्कि नियम अपनाने से ही लाभ मिलता है।”
“आज के भाग-दौड़ भरे जीवन में अधिकतर लोग नीम या बबूल की दातुन नहीं कर पाते। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम मुख-स्वच्छता के महत्व को नजरअंदाज करें।
यदि ब्रश और पेस्ट ही प्रयोग कर रहे हैं, तो भी ध्यान रखें—
ब्रश कठोर न हो,
अत्यधिक घिसाई न हो,
दिन में कम-से-कम दो बार दाँत साफ हों,
और भोजन के बाद मुख को अवश्य धोया जाए।
इससे आधुनिक साधनों से भी वही लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जो हमारे ऋषियों ने दातुन से बताया था।”
“तो इस प्रकार दन्तधावन केवल दांतों की सफाई नहीं, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य की नींव है। क्योंकि जब मुख स्वच्छ होता है, तो शरीर रोग मुक्त होता है और मन भी प्रसन्न रहता है। और अंततः— मुस्कान वही सच्ची, उज्ज्वल और हृदयस्पर्शी होती है, जो स्वच्छ मुख से प्रकट होती है। इसलिए आयुर्वेद हमें सिखाता है— दिनचर्या की हर शुरुआत स्वच्छता से करो, क्योंकि स्वच्छता ही स्वास्थ्य का प्रथम पड़ाव है।
धन्यवाद |
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