Drishya Dharma
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वानरों के युद्ध की कथा
ये कहानी केवल वानरों की लड़ाई की नहीं है, बल्कि इसमें जीवन के कई गहरे संदेश छिपे हैं. प्राचीन काल में एक नगर के समीप एक वैश्य का पुत्र रहता था। उसने गन्ने के खेतों के बीच एक देवस्थान बनवाया। निर्माण कार्य में लगे कारीगर और मज़दूर सुबह अपना काम शुरू करते और दोपहर तक काम करने के बाद वो भोजन के लिए नगर चले जाते।
वहाँ एक विशाल लकड़ी का खंभा पड़ा था, जो बीच से चिरा हुआ था। और उसमें एक बड़ी-सी खूँटी ठोंक दी गई थी, ताकि चिरी हुई लकड़ी बंद न हो सके।
एक दिन वानरों का झुंड वहाँ आ पहुँचा। बंदर तो स्वभाव से ही चंचल होते हैं। वे मंदिर की छत और दीवारों पर कूदने-फाँदने लगे। उनमें से एक मूर्ख बंदर उस आधे-चिरे खंभे पर आकर बैठ गया और उस खूँटी को खींचने लगा।
जैसे ही उसने खूँटी निकाली, खंभा ज़ोर से बंद हो गया। उस मूर्ख वानर के गुप्तांग उसमें फँसकर कुचल गए। पीड़ा से तड़पते-तड़पते वह वहीं मर गया।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि अनायास चेष्टा करने वाला, दूसरों के काम में बेवजह हस्तक्षेप करने वाला, स्वयं ही अपने विनाश का कारण बनता है।”
अब कहानी के अगले हिस्से की तरफ़ बढ़ते हैं…
एक घने जंगल में दो सियार रहते थे — उनमें से एक का नाम दमनक और दूसरे का करटक था ।
ये दोनों कभी सिंहराज पिंगलक के मंत्रीपुत्र थे लेकिन उन्हें दरबार से निकाल दिया गया था एक दिन दमनक ने करटक से कहा:
“मित्र! जीवन केवल पेट भरने के लिए नहीं है। अगर सिर्फ भोजन ही उद्देश्य हो तो यह सब वन भी हमें पर्याप्त है। परंतु यश और सम्मान वही पाता है जो राजा की सेवा करता है।” और मित्र का उपकार करने और शत्रु का नाश करने वाले ही राजा का आश्रय पाते हैं। केवल पेट भरने के लिए तो हर जीव जी ही लेता है।”
करटक ने उसकी बात सुन कर उसका जवाब देते हुए कहा :
“लेकिन मित्र! बिना बुलाए राजा के पास जाना उचित नहीं है। जो व्यक्ति बिना पूछे राजकार्य में हस्तक्षेप करता है, वह असम्मान और उपहास का पात्र बनता है।”
दमनक और करटक दोनों बात कर ही रहे थे की तभी दमनक ने अपने राजा सिंघराज पिंगलक को सरोवर के किनारे आते देखा दमनक को राजा के चेहरे पर भय और चिंता साफ़-साफ़ दिख रही थी
दमनक ने जब यह देखा, तो करटक से कहा: “मित्र!, देखो, आज हमारा स्वामी भयभीत है और यही अवसर है। क्योंकि
डरे हुए राजा के समीप जाना आसान होता है और इस बार मैं अपनी बुद्धि से उसका विश्वास जीतकर पुनः दरबार में स्थान प्राप्त करूँगा।”
करटक बोला :
लेकिन मित्र , राजा तक पहुँचना सरल नहीं है। राजा सांप के समान होते हैं — यदि खुश हों तो मणि, और खुश न हों तो सीधा दंड मिलता है लेकिन फिर भी अगर तूने ठान लिया है, तो मैं बस तुझे यही कहूंगा कि सावधानी से कदम आगे बढ़ाना.
दमनक राजा की ओर चल दिया वो धीरे-धीरे राजा के पास पंहुचा की तभी उसको राजा के द्वारपालों ने रोक लिया पर पिंगलक ने दमनक को देख कर द्वारपालों से कहा :
“उसे आने दो। वह हमारे पुराने मंत्री का पुत्र है। उसे हमसे मिलने का पूरा अधिकार है।”
दमनक ने जाकर प्रणाम किया।
पिंगलक ने उससे पूछा : अरे दमनक ! इतने दिनों बाद आए हो। कहो, सब ठीक तो है?”
दमनक बोला: जी महाराज, महाराज! हम आपके सेवक हैं। और आज आपके मुख पर चिंता देखी, तो इसलिए मै आपके पास आपकी इस चिंता का कारण जानने आया हूँ आखिर राजा के कार्य में छोटा-बड़ा परामर्श देना मंत्री का कर्तव्य है।”
पिंगलक ने दमनक की ये बात सुन कर बड़े ही चिंतित स्वर में कहा: दमनक! मेरी चिंता और भय का कारण ये है की आज मैंने जंगल में एक भयंकर शब्द सुना है। और वो आवाज़ सुन कर मुझे ऐसा लगा जैसे कोई महाशक्ति यहाँ आई हो। बस इसी भय से मैं स्थिर नहीं हो पा रहा हूँ।”
दमनक ने ध्यान से राजा की चिंता का कारण जाना और बोला: महाराज! केवल शब्द से भयभीत होना उचित नहीं है। केवल शब्द सुनकर निष्कर्ष निकालना और भयभीत होना बुद्धिमानी नहीं है। महाराज आप अपनी इस चिंता को मुझे सौंप दीजिये. मैं खुद जाकर देखता हूँ कि वह आवाज़ किसकी है। यदि शत्रु है तो उपाय करेंगे, और यदि कोई अन्य जीव है तो शांति स्थापित करेंगे।”
पिंगलक ने उसकी बात सुन कर बोला: दमनक! तुम सचमुच बुद्धिमान हो। तुम्हारी बात सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई जाओ और जाकर देखो और मुझे तुरंत आकर सारी बात विस्तार से बताओ.
राजा की आज्ञा पाकर दमनक ने वन में जाकर खोज की। और वहाँ उसने देखा — की जंगल में एक शक्तिशाली बैल आ गया था , जिसका नाम संजिवक था।और वो शरीर से बहुत बलवान था और उसकी आवाज़ बहुत बुलंद थी और उसकी गूँजती हुई ध्वनि को सुन कर ही पिंगलक भयभीत हो गया था।
दमनक ने संजिवक से बात की और समझाया कि वह अहिंसक, शांत स्वभाव का प्राणी है।
बैल के स्वाभाव को समझने के बाद दमनक राजा पिंगलक के पास वापस आया और उसे पूरी बात विस्तार से बताई उसने राजा से कहा :
“महाराज! आपके भय का कारण एक बैल है। वह आपकी शरणागत होना चाहता है। महाराज मेरी सलाह यही है की आप उसे अपना मित्र बना लें।”
पिंगलक ने दमनक की बात मानी और संजिवक को अपने पास बुलाया। और फिर धीरे-धीरे संजिवक और पिंगलक में गहरी मित्रता हो गई। वे साथ-साथ रहते, और साथ-साथ ही भोजन भी करते।
मगर शायद किसी को राजा और बैल की दोस्ती से कुछ ख़ास ख़ुशी नहीं हुई| जब दमनक ने देखा कि संजिवक का महत्व बढ़ता जा रहा है, और राजा का सारा स्नेह और समय उसी के साथ बीतने लगा है, तो उसके मन में ईर्ष्या जागने लगी।
दमनक ने सोचा: “अब राजा मुझे भूलने लगा है। यदि यह बैल अधिक शक्तिशाली बन गया, और राजा से इसकी मित्रता ऐसे ही गहरी होती गई तो, हमारी स्थिति संकट में पड़ जाएगी। दमनक ठहरा सियार और खुद को इस संकट में देख कर कुछ तो युक्ति सोचना तो साफ़ था उसने एक चाल चली।
दमनक ने पहले पिंगलक के पास जाकर कहा: “महाराज! सावधान रहें। संजिवक अपने मन में आपके सिंहासन की लालसा लिए बैठा है । मैंने उसको कहते सुना है की वह आपको हटाकर स्वयं राजा बन जायेगा मुझे तो बहुत डर लग रहा है महाराज,”.
पिंगलक यह सुनकर सशंकित हो गया। दमनक समझ गया की उसकी चाल काम कर गई है. अब इसके बाद दमनक, संजिवक के पास गया और बोला: मित्र! सावधान रहो। पिंगलक अब तुमसे ईर्ष्या करने लगा है। उसको डर है की कहीं तुम्हारे रहते उसका दबदबा कम न हो जाये उसी भय के कारण वो तुम पर हमला करने की युक्ति बना रहा है. हे भगवन ये कैसा राजा है, जो अपने ही मित्र के बारे में ऐसा सोच रहा है, ये कहकर दमनक वह से चला गया और इस तरह दमनक द्वारा दोनों ओर संदेह की दीवार खड़ी कर दी गई। अब पिंगलक और संजिवक दोनों एक-दूसरे से सावधान हो गए।और फिर एक दिन उन दोनों के मनो की नफरत इतनी ज़्यादा बढ़ गई की वे दोनों युद्ध के लिए आमने-सामने आ खड़े हुए। वन में भयंकर गर्जना हुई। पिंगलक ने अपने नख और दाँत निकाल लिए । और संजिवक ने भी जोर से हुँकार भरी।
वानर, सियार, हरिण — सभी जानवर दूर खड़े भय से उस संग्राम के दृश्य को देखने लगे। युद्ध आरंभ हुआ। सिंह और बैल में भीषण संग्राम हुआ।
और आखिरकार पिंगलक ने अपनी शक्ति और तीव्रता से संजिवक को मार डाला। बैल भूमि पर गिर गया। और पुरे वन में सन्नाटा छा गया। इधर युद्ध में पिंगलक विजयी हुआ, और उधर दमनक की नीति का खेल भी सफल हो चुका था।
उसने संजिवक को नष्ट कराकर अपना प्रभाव पुनः स्थापित कर लिया।
इस प्रकार वानरों के युद्ध से प्रारंभ हुई कथा. दमनक की नीति, पिंगलक के भय,और संजिवक की मित्रता और अंततः उसके विनाश पर आकर समाप्त होती है ।
वानरों की मूर्खता की कथा से लेकर, सिंहराज के भय और सियारों की राजनीति एवं संजिवक की मित्रता और अंततः उसके विनाश तक हर जगह एक ही शिक्षा मिलती है की अनधिकार चेष्टा विनाश करती है….और ईर्ष्या और छल से मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। लेकिन अगर उचित समय पर बुद्धि और नीति का सही प्रयोग किया जाए तो वो उन्नति का रास्ता दिखलाती है
धन्यवाद
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