Drishya Dharma
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वानरराज का बदला
इस कहानी में दूरदर्शिता की अहमियत, लोभ का विनाशकारी परिणाम और प्रतिशोध की ज्वाला – सब कुछ है। यह कथा केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि इसमें जीवन की गहरी सीख छुपी है। यह एक न्यायप्रिय राजा चन्द्र, उसके परिवार, एक बुद्धिमान वानरराज और एक भयानक मगर राज की कथा है।
बहुत समय पहले की बात है। एक नगर था जो ऐश्वर्य और वैभव से भरा हुआ था। वहाँ के राजा का नाम राजा चन्द्र था। वह न सिर्फ अपनी शक्ति और धन-दौलत के लिए प्रसिद्ध था, बल्कि न्यायप्रियता और दयालु स्वभाव के लिए भी लोगों के बीच आदर पाता था। उसके राज्य में प्रजा सुखी थी। महल में सोने-चाँदी, रत्न-जवाहरात और विलासिता की कोई कमी न थी।
राजा चन्द्र के कई राजकुमार थे। वे छोटे-छोटे थे और चंचल स्वभाव के थे। उन्हें खेलकूद बहुत पसंद था। पर उनकी एक अजीब आदत थी—उन्हें बंदरों से खेलना बहुत अच्छा लगता था।
राजमहल के विशाल उद्यान में अनेक बंदर पाले गए थे। वे राजकुमारों के साथी थे। जब राजकुमार सुबह खेलते, तो बंदर उनकी नकल करते, कूदते-फाँदते और तरह-तरह की शरारतें करके उन्हें हँसाते।
उन बंदरों का एक नेता था, जिसे सब वानरराज कहते थे।
यह वानरराज साधारण बंदर नहीं था। वह बुद्धिमान था, चतुर था और इतना ही नहीं उसमे एक एक अनोखी खूबी थी भविष्य देखने की कला यानि आने वाले समय में क्या घटित होने वाला है वो ये सब आसानी से देख सकता था। राजकुमार भी उसे बहुत सम्मान देते थे। वे उसे केवल खेल का साथी नहीं, बल्कि वो उसे एक प्रकार से गुरु भी मानते थे।
वानरराज केवल शरारतों में ही नहीं, बल्कि नीति और दूरदर्शिता यानि भविष्य देखने में भी माहिर था। वह अक्सर अपने साथियों को समझाता कि देखो जीवन केवल आज की खुशी के बारे में नहीं होता, बल्कि हमे आने वाले कल की चिंता भी करनी चाहिए।
महल में घोड़ों के साथ-साथ कई नर भेड़ भी पाले जाते थे। राजकुमार उनका उपयोग रथ खींचने और खेलों में करते।लेकिन
उनमें से एक भेड़ बहुत लालची था। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि वह हमेशा खाने की तलाश में भटकता रहता।
रोज़ की आदत थी कि वह चुपके से महल की रसोई में घुस जाता। जो भी मिलता—चावल, आटा, दाल या पकवान—वह सब गपक जाता। रसोइये उसे देखकर चिल्लाते, और डंडों से मारकर बाहर निकालते। लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आता।
वानरराज यह सब देख रहा था। उसकी बुद्धिमान आँखों ने तुरंत भविष्य में आने वाली आपदा का चित्र बना लिया।
उसने सोचा—
“यह भेड़ एक दिन अनर्थ करेगा। जिस दिन कोई रसोइया इसे जलती लकड़ी से मारेगा, तो यह भागकर अस्तबल में जाएगा। वहाँ सूखी घास और रस्सियाँ रखी हैं। जिनमे आग लग जाएगी, घोड़े जल जाएँगे, और फिर उनके घावों के इलाज के लिए वैद्य बंदरों की चर्बी माँगेंगे। तब हमारी जाति का नाश होगा।”
भविष्य के इस दृश्य को देख वानरराज का मन काँप उठा। वानरराज ने अपने सभी साथियों को बुलाया।सभी ने देखा की वानरराज की आँखों में आँसू थे और आवाज़ में चिंता।
वह बोला— साथियो ! यह महल, यह बाग-बगीचे और यह सुखद जीवन हमें बहुत महँगा पड़ेगा। तुम लोग सोचते हो कि हमें मीठे फल मिलते हैं, राजकुमार हमें प्यार करते हैं, हम सुरक्षित हैं। पर ये सब दिखावा है सब झूठ है ।
मैं साफ देख रहा हूँ कि आने वाले समय में कोई बड़ी मुसीबत हमारा विनाश कर देगी। अभी भी समय है—यहाँ से निकलकर जंगल लौट चलो। वरना हम सब मारे जाएँगे।”
लेकिन वानरराज की बाते सुन कर बंदर हँस पड़े। और उनमे से एक बोला—
“अरे वानरराज! तुम्हारी बुद्धि अब बूढ़ी हो गई है। हम क्यों अपनी सुख-सुविधा छोड़कर जंगल की कठिनाई में जाएँ?”
दूसरे बन्दर ने भी पहले वाले की हां में हां मिलते हुए कहा
“हाँ हाँ, यहाँ हमें मीठे फल मिलते हैं, राजकुमारों का स्नेह है। जंगल में काँटे, भूख और खतरे हैं। हम मूर्ख नहीं हैं कि यहाँ का सुख छोड़ दें।”
क्किसी ने वानरराज की बात नहीं मणि वो कहते हैं है न विनाश काल विपरीत बुद्धि , वनराज अब क्या ही कर सकते थे उन्होंने दुखी होकर सिर झुका लिया। और कहा— मूर्खों! सुख और लोभ आँखों पर पट्टी बाँध देते हैं। तुम भविष्य का परिणाम नहीं देख पा रहे हो। मैं तुम्हें आखिरी बार चेतावनी देता हूँ—यह सुख तुम्हारा विनाश करेगा।”
लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।
अंततः वानरराज अकेला ही राजमहल छोड़कर जंगल की ओर चला गया।
कुछ ही दिनों बाद वही हुआ जिसकी आशंका वानरराज ने जताई थी।
लोभी मेढ़ा फिर रसोई में घुसा। रसोइये ने गुस्से में जलती हुई लकड़ी उस पर फेंकी।
लकड़ी उसके बालों से चिपक गई। वह घबराकर भागा और सीधा अस्तबल में घुस गया।
अस्तबल में सूखी घास और रस्सियाँ पड़ी थीं। देखते ही देखते आग फैल गई।
घोड़े चीखने लगे, रस्सियाँ जल गईं। कुछ घोड़े मर गए, कुछ बेतहाशा भाग निकले।
महल में हाहाकार मच गया।
राजा ने तुरंत वैद्यों को बुलाया।
वैद्य घोड़ों को देखकर बोले—
“महाराज, इन जले घावों का इलाज केवल बंदरों की चर्बी से बनी मरहम से हो सकता है।”
राजा चन्द्र ने गम्भीर होकर आदेश दिया—
“सैनिकों! सभी बंदरों को पकड़ो और मार डालो। उनके शरीर से चर्बी निकालकर मरहम तैयार करो।”
सैनिकों ने डंडे और पत्थर उठाए और बंदरों पर टूट पड़े।
राजमहल में जो बंदर सुख और सुरक्षा के सपनों में जी रहे थे, वे सब मारे गए।
जब यह समाचार वानरराज तक पहुँचा, उसका हृदय फट गया। वह विलाप करने लगा— “हाय! मेरी चेतावनी किसी ने नहीं सुनी। मैंने कहा था कि यह सुख हमें नष्ट करेगा, पर सबने मेरी बात पर हँसी उड़ाई। अब देखो, मेरा पूरा कुल समाप्त हो गया। राजा ने निर्दोषों का रक्त बहाया। यह घोर अन्याय है। मैं इस अन्याय का बदला लूँगा। अपने साथियों की आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब मैं राजा और उसके कुल को खत्म कर दूँगा।” उस दिन से वानरराज के मन में प्रतिशोध की अग्नि जलने लगी।
राजमहल छोड़कर जंगल में रहने वाला वानरराज अब दिन-रात एक ही बात सोचता— “मेरे पूरे कुल का नाश हो गया। राजा चन्द्र ने निर्दोषों का रक्त बहाया है । यह अन्याय बिना दंड के नहीं रह सकता। मुझे बदला लेना ही होगा।”
वह भोजन करता तो भी उसके मन में केवल बदले की अग्नि जलती रहती। वह पेड़ों की शाखाओं पर बैठा तो भी उसकी आँखों में अपने मारे गए साथियों की छवि घूमती। धीरे-धीरे उसका हृदय कठोर हो गया।
एक दिन वानरराज जंगल के भीतर गहराई में भटक रहा था। अचानक उसने एक तालाब देखा।
तालाब शांत था, लेकिन उसके चारों ओर कई मनुष्यों और पशुओं के पैरों के निशान बने हुए थे।
वानरराज ने गौर किया— “यह अजीब है। इतने सारे पदचिह्न तालाब तक आते हैं, पर कोई लौटकर गया नहीं दिखता। जरूर इस तालाब में कोई रहस्य छुपा है। शायद यहाँ कोई भयानक नरभक्षी प्राणी रहता है।”
उसने सीधा तालाब से पानी पीने की बजाय एक उपाय निकाला। उसने कमल का एक डंठल तोड़ा और उसका एक सिरा तालाब में डाला, दूसरा सिरा अपने मुँह में रखा और नली के सहारे पानी पी लिया।
जैसे ही वानरराज ने ऐसा किया, अचानक तालाब का पानी उफनने लगा। उसमें से एक विशाल मगरमच्छ बाहर आया। उसकी आँखें अंगारे की तरह चमक रही थीं और उसकी गर्दन में एक चमचमाता हुआ कंठहार था।
मगर ने आश्चर्य से कहा—
“वाह वानरराज! यहाँ आने वाला कोई जीव कभी बचकर नहीं जाता। सब सीधे मेरे पेट में चले जाते हैं। पर तूने अपनी बुद्धि से मुझे मात दे दी। तूने पानी सीधे तालाब से नहीं पिया, बल्कि कमलनाल का सहारा लिया। तेरी दूरदर्शिता देखकर मैं प्रसन्न हूँ। माँग, जो भी वर माँगना है।”
वानरराज ने अवसर भाँप लिया। उसने पूछा— “मगरराज! तुम्हारी भक्षण-शक्ति कितनी है? तुम कितने प्राणियों को खा सकते हो?”
मगर मुस्कुराकर बोला— “पानी में मैं हजारों मनुष्यों और पशुओं को पलभर में खा सकता हूँ। लेकिन भूमि पर मेरी शक्ति नहीं चलती। वहाँ तो मैं एक गीदड़ तक नहीं पकड़ सकता।”
यह सुनते ही वानरराज के मन में एक योजना बनी।
वानरराज बोला— “मगरराज, यदि तुम यह चमकता हुआ कंठहार मुझे दे दो, तो मैं तुम्हें एक बड़ा भोज ला सकता हूँ। मैं एक राजा और उसके परिवार को यहाँ तक ले आऊँगा। फिर तुम जितना चाहो उन्हें खा लेना।”
मगर को यह प्रस्ताव पसंद आया। उसने खुशी-खुशी अपना कंठहार उतारकर वानरराज को दे दिया। वानरराज कंठहार पहनकर राजमहल की ओर रवाना हुआ। जब वह महल पहुँचा, तो कंठहार की चमक देखकर सब दंग रह गए।
राजमहल मानो जगमगाने लगा। राजा चन्द्र ने आश्चर्य से पूछा— “वानरराज! यह अद्भुत कंठहार तुझे कहाँ मिला? इतना सुंदर हार मैंने जीवन में नहीं देखा।”
वानरराज ने विनम्र स्वर में कहा— “महाराज, जंगल में एक तालाब है। वहाँ रविवार की सुबह जो भी गोता लगाता है, उसे ऐसे ही कंठहार मिलते हैं। यह तो केवल एक है, वहाँ तो अनगिनत हैं।”
राजा चन्द्र की आँखों में लोभ चमक उठा। उसने सोचा— “अगर मैं अपने परिवार और दरबारियों के साथ उस तालाब में स्नान करूँ, तो हम सबके गले में ऐसे कंठहार होंगे। कितना वैभव बढ़ जाएगा!” राजा ने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि वह अवश्य वहाँ जाएगा।
निर्धारित रविवार को राजा चन्द्र अपने परिवार, रानियों और सैकड़ों दरबारियों के साथ वानरराज के पीछे-पीछे जंगल पहुँचा।
सुबह का समय था। वातावरण शांत था। तालाब का जल चाँदी की तरह चमक रहा था।
वानरराज ने राजा से कहा— महाराज, आप थोड़ी देर रुकें। पहले आपके दरबारी और परिवारजन तालाब में उतरें। अंत में मैं आपको विशेष स्थान पर ले जाऊँगा जहाँ सबसे अधिक कंठहार हैं।” राजा ने प्रसन्न होकर हामी भर दी। एक-एक करके दरबारी, सैनिक और परिवारजन तालाब में उतरे। पर जैसे ही वे पानी में गए, सब मगरराज का शिकार बन गए।
तालाब का पानी लाल हो गया। लेकिन बाहर खड़े राजा को कुछ दिखाई नहीं दिया। राजा हैरान था कि कोई भी व्यक्ति लौटकर क्यों नहीं आ रहा। तभी वानरराज फुर्ती से एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गया। वहाँ से वह जोर से चिल्लाया—
“महाराज चन्द्र! तुम्हारे सारे दरबारी और परिवारजन मगरराज का आहार बन चुके हैं। तुमने मेरे पूरे कुल को नष्ट किया था। आज मैंने तुम्हारे कुल का अंत कर दिया। यह प्रतिशोध है। यह न्याय है!” राजा यह सुनकर तिलमिला उठा। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह तलवार निकालकर इधर-उधर दौड़ने लगा, पर उसके सामने कोई नहीं था। वानरराज ऊँचाई पर सुरक्षित था, और मगरराज पानी में।
राजा असहाय होकर वहीं बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। अंततः वह अकेला और निराश होकर महल लौट गया। जब सब शांत हो गया, तो मगरराज तालाब से बाहर निकला। उसने हँसते हुए कहा— “वानरराज! तुम्हारी बुद्धि सचमुच अद्भुत है। तूने अपने प्रतिशोध को पूरा करने का जो तरीका अपनाया, वह चतुराई का उत्तम उदाहरण है। तूने मुझे भी भोजन दिया और अपना बदला भी ले लिया।”
वानरराज ने मगरराज की ओर देखा। लेकिन उसके चेहरे पर न खुशी थी, न गर्व। उसका हृदय अब भी अपने कुल की पीड़ा से भरा हुआ था। उसने धीमी आवाज़ में कहा—
“मगरराज, प्रतिशोध से मेरे मन की आग तो ठंडी हुई, लेकिन अपने साथियों की याद कभी नहीं मिटेगी।”
वह उदास होकर वहाँ से चला गया। प्रतिशोध की ज्वाला से जलता हुआ वानरराज आखिरकार अपने लक्ष्य में सफल हो गया। उसने अपने कुल के रक्त का बदला ले लिया। लेकिन बदला लेने के बाद भी उसके हृदय में शांति नहीं आई।
वह अकेला था। जंगल की शाखाओं पर बैठता तो उसे अपने साथियों की हँसी-ठिठोली याद आती। कभी राजमहल के बगीचे में बच्चों के साथ खेलते बंदरों की कूद-फाँद उसकी आँखों में तैर जाती। वह सोचता— “काश, उन्होंने मेरी बात मान ली होती। काश, उन्होंने वैभव के लोभ में आँखें न मूँदी होतीं।”
उसका मन भारी रहता। वह अक्सर पेड़ों की छाँव में बैठकर लंबी साँसें भरता। प्रतिशोध ने उसे संतुष्ट किया, पर उसके जीवन की खाली जगह कभी नहीं भर पाई। उधर नगर में लोगों ने देखा कि राजा चन्द्र अकेला लौट आया है। रानियाँ नहीं, राजकुमार नहीं, दरबारी नहीं—सभी लापता थे। जब लोगों ने सच्चाई सुनी कि वे सब एक तालाब में समा गए, तो नगरवासी दंग रह गए।
लोगों में फुसफुसाहट होने लगी— “यह सब लोभ का परिणाम है। राजा वैभव की चाह में अपने ही परिवार को ले गया और सबका अंत हो गया।” “वानरराज सही था। दूरदर्शी की बात को अनदेखा करने का यही नतीजा है।”
राजा चन्द्र का गौरव धूमिल हो गया। वह अब अकेला, असहाय और तन्हा था। धीरे-धीरे यह कथा जंगल और नगर दोनों जगह फैल गई। लोग एक-दूसरे से कहते— “सुख और ऐश्वर्य देखकर विवेक मत खोना। लोभ हमेशा विनाश का मार्ग दिखाता है।” “वानरराज ने पहले ही भविष्य का अनुमान लगा लिया था। अगर उसकी बात मानी जाती तो बंदर भी बच जाते और राजा का कुल भी।”
बच्चों को यह कथा सुनाई जाने लगी। माता-पिता उन्हें समझाते—
“बेटा, कभी लोभ मत करना। और जब कोई समझदार तुम्हें चेतावनी दे, तो उसे ध्यान से सुनना।”
वानरराज अब भी अकेला था। एक दिन उसने तालाब के किनारे मगरराज से कहा— “मगरराज, मैंने अपना प्रतिशोध पूरा कर लिया। लेकिन मन में एक कड़वाहट रह गई है। जीवन केवल बदला लेने के लिए नहीं होना चाहिए। काश, मेरे साथी समझदारी से काम लेते तो हमें यह दिन न देखना पड़ता।”
मगरराज ने हँसते हुए कहा— “वानरराज, यही तो संसार का नियम है। कुछ लोग भविष्य देखते हैं, कुछ नहीं। जो नहीं देखते, वे समय से पहले नष्ट हो जाते हैं। तू उनमें से नहीं था। तू दूरदर्शी था।”
वानरराज ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया— “दूरदर्शिता केवल अपने लिए नहीं होती, बल्कि समाज के लिए होती है। लेकिन जब समाज ही आँख मूँद ले, तो बुद्धिमान अकेला पड़ जाता है।” फिर वह धीरे-धीरे जंगल की ओर चल पड़ा।
इस प्रकार, वानरराज की कथा पूरी होती है। यह केवल बंदरों और राजा की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का दर्पण है।
ये कथा हमे सिखाती है कि “सुख की चाह में आँखें मत मूँदो, लोभ से बचो और दूरदर्शी की सलाह को अनदेखा मत करो।”
जब इंसान सुख-सुविधा और दौलत की चाह में अंधा हो जाता है, तो वह सही-गलत सोचने की ताकत खो देता है और इसका नतीजा हमेशा बुरा ही निकलता है। अगर हम किसी समझदार या अनुभव वाले व्यक्ति की बात को नजरअंदाज कर देते हैं, तो धीरे-धीरे मुश्किलें हमारे पीछे पड़ जाती हैं और अंत में सबकुछ बिगड़ जाता है। इसी तरह, जब हमारे साथ या समाज में अन्याय होता है, तो मन में गुस्सा और बदला लेने की आग ज़रूर पैदा होती है, जो आगे चलकर बड़ा रूप ले लेती है।
वानरराज की कहानी केवल बीते समय की गाथा नहीं है। ये कथा की सीख हमारे मनुष्य जीवन में भी लागु होती है घर-परिवार, समाज या राष्ट्र—हर जगह हमें दूरदर्शिता की ज़रूरत है। लोभ और तृष्णा कभी खत्म नहीं होती, पर विवेक से हम खुद को और अपनों को बचा सकते हैं।
धन्यवाद
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