Drishya Dharma
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चार ब्राह्मणों की कथा – लोभ और परिश्रम की सीख
यह कहानी है चार ब्राह्मण मित्रों की। ये चारों दोस्त निर्धन थे, उनके पास न पैसा था, न समाज में कोई मान-सम्मान। लेकिन इनकी सबसे बड़ी ताकत थी – उनकी दोस्ती और उनका साहस। ये कहानी हमें बताएगी कि कैसे परिश्रम और समझदारी जीवन को सही दिशा दे सकती है और कैसे लोभ यानी लालच इंसान को बर्बादी की ओर ले जाता है।
पुरातन काल की बात है। एक नगर में चार ब्राह्मण के बेटे रहते थे। ये चारों आपस में बहुत अच्छे मित्र थे। चाहे दुख का समय हो या सुख का, ये हमेशा एक-दूसरे के साथ ही खड़े रहते थे।
लेकिन उनके पास कोई काम-धंधा नहीं था। वे दिनभर इधर-उधर भटकते और लोगों की जाली कटी बातों का सामना करते। धीरे-धीरे नगर के लोग उनका मज़ाक उड़ाने लगे। वो चारो कहीं भी जाते तो लोग ताने मारते, कोई कह देता – “अरे, इनका क्या भरोसा, खुद का पेट नहीं भर सकते।” तो कोई कहता – “कामचोर हैं, जीवन भर निर्धन ही रहेंगे।”
समाज में उनका सम्मान तो वैसे ही नहीं था, लेकिन गरीबी की वजह से उनके परिवार वाले को भी वो चारो भोझ लगने लगे थे , चारों मित्र धीरे-धीरे इस सच्चाई को समझने लगे कि इस दुनिया में धन के बिना इंसान की कोई इज़्ज़त नहीं होती। बिना पैसे न तो समाज आपको मानता है, न परिवार में आपकी कद्र होती है। यहाँ तक कि रिश्तेदार और मित्र भी दूरी बना लेते हैं।
उन्हें एहसास हुआ कि – धन के बिना वीरता, सुंदरता, पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक की किसी भी ज्ञान का कोई महत्व नहीं।
यह सोचते-सोचते उन्होंने तय कर लिया कि अब वो चारो अब और उपहास नहीं सहेंगे।
एक दिन चारों मित्र बैठे-बैठे अपने हालात पर चर्चा करने लगे। सभी ने मिलकर फैसला किया कि वे अब अपने नगर को छोड़ देंगे और किसी दूसरे देश जाकर धन कमाएँगे। और फिर उन्होंने अपने परिवार वालों, रिश्तेदारों और समाज से विदा ली। और कहा – “अब हम लौटकर तभी आएँगे जब सफलता पाकर धनवान बनेंगे। अगर ऐसा नहीं हो पाया तो हम चारो के लिए इस निर्धन जीवन से अच्छा मर जाना होगा , और फिर इस तरह चारों मित्र साहस और उम्मीद से भरे सफर पर निकल पड़े।
कुछ देर चलने के बाद वे क्षिप्रा नदी के तट पर पहुँचे।नदी के बहते ठन्डे पानी को देख कर गर्मी से बुरी हालत और पसीनो में लथपथ युवकों के चेहरे पर कुछ रहत आयी उन चारो ने विचार किया की पहले स्नान करेंगे।और फिर वो चारो ठंडे पानी में उतरे, स्नान किया और फिर महाकाल बाबा को प्रणाम किया। और उन्होंने मन ही मन आशीर्वाद माँगा कि हे बाबा हमारे इस सफर को सफल बनाये ।
इस तरह चारो ने स्नान करने के बाद अपनी यात्रा फिर शुरू की और थोड़ी ही चलने के बाद रास्ते में उन्हें एक जटाजूटधारी योगी दिखाई दिए। योगी का नाम था भैरवानन्द।
भैरवानन्द ने उन्हें देखकर अपने आश्रम में बुलाया।और उन्होंने चारों से पूछा – “बच्चो, कहाँ जा रहे हो? यहाँ आने का तुम्हारा क्या उद्देश्य है ?
चारों ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर अपने मन की बात योगी को बता दी।
उन्होंने कहा –
“बाबा, हम चारों के पास कोई काम नहीं। परिवार वाले रोज़ हमें ताने देते हैं। नगर में लोग हमारा मज़ाक उड़ाते हैं। हम इस निर्धन जीवन से परेशान हो चुके हैं। लेकिन अब हमने ठान लिया है कि दूसरे किसी बड़े शहर में जाकर कोई काम करेंगे और धन कमाएंगे और धन कमाने के बाद ही अपने घर लौटेंगे , और अगर धन नहीं मिला तो आत्महत्या कर लेंगे, क्योंकि ऐसे जीवन से मर ही जाना होगा
चारों की बातें सुनकर योगी कुछ देर चुप रहे और फिर बोले –
“बेटा, धनवान बनना किस्मत पर निर्भर करता है। भाग्य में हो तो ही जीवन में सफलता और धन की प्राप्ति होती है , लेकिन उन चारो को कहा ये बात सुननी थी वो चारों मित्र तो बस अपनी बात पर अड़े रहे , और उन्होंने कहा –
“भाग्य भले ही ज़रूरी हो, लेकिन साहस और प्रयास से इंसान अपने भाग्य को बदल सकता है। अगर इंसान मौके का फायदा उठाए तो वह अपनी किस्मत खुद बना लेता है। इसलिए हमें कमजोर मत कीजिए। हमारा इरादा बड़ा है और हमें बस किसी मार्गदर्शन की ज़रूरत है।”
चारों की दृढ़ता देखकर योगी प्रसन्न हो गए।वो बोल –
“ठीक है बच्चो, मैं तुम्हें मार्ग बताता हूँ। तुम सब हाथों में दीपक लेकर हिमालय की ओर चलो। जहाँ जिस युवक का दीपक गिर जाएगा, वहीं ठहर जाना और उस जगह को खोदना। वहाँ तुम्हें खजाना मिलेगा। फिर तुम सब उस खजाने को लेकर सुख से अपने घर लौट जाना।”
चारों मित्रों ने योगी पर विश्वास किया।और फिर उन चारो ने दीपक उठाए और हिमालय की ओर चल दिए । रास्ता कठिन था, लेकिन उनके दिल में उम्मीद थी कि आगे जाकर जीवन बदल जाएगा।
कुछ दूर चलते ही अचानक उनमें से एक युवक का दीपक ज़मीन पर गिर गया।
बाकी तीनों ने कहा –
“भाई, योगी बाबा ने कहा था कि जहाँ दीपक गिरे, वहीं खजाना मिलेगा। चलो, यही जगह खोदते हैं।”
चारों ने मिलकर ज़मीन खोदनी शुरू की। कुछ देर में वहाँ से ताँबे की खान निकल आई।
वो युवक, जिसका दीपक गिरा था, खुशी से उछल पड़ा। उसने कहा –देखो, यहाँ तो ताँबा निकला है। जितना चाहो उतना ताँबा है। हम सब यही रुक जाते हैं और ताँबा लेकर घर लौटते हैं। इससे हमारा जीवन बदल जाएगा।”
लेकिन बाकी तीनों मित्र हँसते हुए बोले –मूर्ख! ताँबे से क्या होगा? दुनिया में ताँबे की कोई बड़ी कीमत नहीं। आगे चलेंगे तो और बहुमूल्य खजाना मिलेगा।”
वो युवक बोला – “तुम्हें अगर आगे जाना है तो जाओ, लेकिन मैं यहीं रुकूँगा। मेरे लिए यही बहुत है।”
ऐसा कहकर वह ताँबा इकट्ठा करने लगा और फिर घर लौट गया।
बाकी तीन मित्र आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर चलने के बाद, दूसरे युवक का दीपक ज़मीन पर गिरा।
उन्होंने खोदना शुरू किया तो वहाँ से चाँदी की खान मिली।
वो युवक खुशी से बोला –
“मित्रो, देखो, यह तो चाँदी है। यह ताँबे से कहीं अधिक मूल्यवान है। इससे हमारा जीवन सुखमय हो जाएगा। अब हमें आगे नहीं जाना चाहिए।”
लेकिन बाकी दो मित्र बोले –
“भाई, अगर पहले ताँबा मिला, फिर चाँदी मिली, तो आगे सोने की खान मिलेगी। हम मूर्ख नहीं जो अभी रुक जाएँ। तुम चाहो तो यहीं रुक जाओ।”
वो युवक बोला –
“ठीक है, मैं यहीं रुकता हूँ। तुम दोनों आगे जाओ।”
इस तरह उसने चाँदी की खान से ढेर सारी चाँदी ली और घर लौट गया।
अब दो मित्र बचे। दोनों आगे बढ़ते रहे। काफी दूरी तय करने के बाद, तीसरे युवक का दीपक गिरा।
उन्होंने खोदना शुरू किया और वहाँ से सोने की खान निकली।
सोना देखकर दोनों की आँखें चमक उठीं। तीसरे युवक ने खुशी से कहा –
“बस, अब और आगे जाने की ज़रूरत नहीं। सोने से बड़ी दौलत और क्या हो सकती है? यह हमारी दरिद्रता का अंत कर देगा। हम धनवान बन जाएँगे।”
लेकिन चौथा युवक, जिसके मन का लालच गहरा होता जा रहा था, वो बोला –
“अरे, सोचो! पहले ताँबा मिला, फिर चाँदी, फिर सोना… तो आगे जरूर रत्नों की खान होगी। वहाँ तो हीरे-जवाहरात मिलेंगे। हमें आगे बढ़ना चाहिए।”
तीसरा युवक बोला –
“तुम्हें अगर आगे जाना है तो जाओ, लेकिन मैं यहाँ ही रुकूँगा। मैं इतना सोना लेकर लौट जाऊँगा कि जीवन भर सुख से रह सकूँ।”
ऐसा कहकर उसने सोना इकट्ठा करना शुरू कर दिया।
अब चौथा युवक अकेला रह गया। उसके मन में केवल एक ही बात थी – “रत्नों की खान मिलेगी और मैं सबसे बड़ा धनवान बनूँगा।”
वह अकेला आगे बढ़ने लगा।
रास्ता बेहद कठिन था। कभी काँटों से उसके पैर लहूलुहान हो जाते। तो कभी बर्फीली हवाओं से उसका शरीर काँप उठता। और कभी भूख और प्यास से हालत खराब हो जाती।
लेकिन उसके मन में लालच इतना गहरा था कि उसने हार नहीं मानी और चलता ही गया।
बहुत दूर जाने के बाद अचानक उसने एक अजनबी आदमी को देखा। उस आदमी का शरीर खून से लथपथ था और उसके सिर पर एक चमकता हुआ चक्र घूम रहा था।
युवक यह दृश्य देखकर हैरान रह गया। वो डरते-डरते उसके पास गया और पूछा –
“आप कौन हैं? आपके सिर पर यह चक्र क्यों घूम रहा है?”
जैसे ही उसने यह कहा, अचानक वह चक्र उस आदमी के सिर से हटकर उस युवक के सिर पर आ गया।
युवक घबरा गया। उसने डरते हुए पूछा –
“यह क्या हुआ? यह चक्र मेरे सिर पर क्यों आ गया?”
वह अजनबी आदमी बोला –
“जब मैं यहाँ आया था, तब यह चक्र मेरे सिर पर चिपक गया था। यह उन लोगों के लिए है जो अत्यधिक लालच में यहाँ पहुँचते हैं। अब जब तुम आ गए हो, तो यह तुम्हारे सिर पर आ गया।”
युवक ने काँपते स्वर में पूछा –
“लेकिन यह चक्र मुझे छोड़कर कब जाएगा?”
अजनबी ने कहा –
“यह चक्र तभी हटेगा जब कोई और व्यक्ति लोभवश यहाँ आएगा। तब तक यह तुम्हारे सिर पर ही घूमता रहेगा।”
युवक ने डरते-डरते कहा –
“इसका मतलब… मैं इस कष्ट से कभी मुक्त नहीं हो पाऊँगा?”
अजनबी ने कहा –
“हाँ, अब तुम भूख, प्यास, नींद या मृत्यु से तो मुक्त रहोगे, लेकिन इस चक्र के घूमने का दर्द अनंत काल तक सहना पड़ेगा। यही अति-लोभी लोगों की सज़ा है।”
इतना कहकर वह अजनबी वहाँ से चला गया।
दुखद अंत
चौथा युवक वहीं रह गया। उसका लालच ही उसकी बर्बादी का कारण बना। अब उसके जीवन में न परिवार था, न सुख। सिर्फ उस चक्र का असहनीय दर्द और अनंत पीड़ा थी ।
सीख
यह कहानी हमें यह सिखाती है अगर हम संतुलन से काम लें और जो मिला उसका सही उपयोग करें, तो जीवन सुखमय बन सकता है। लेकिन अगर हम लालच में अंधे हो जाएँ, तो वही लालच हमें बर्बादी की राह पर ले जाता है। और जीवन की सबसे बड़ी सीख यही है की हिम्मत, मेहनत और संतुलन से ही असली संपत्ति बनती है।
धन्यवाद।
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