महात्मा जड़भरत: मोह और आसक्ति से मुक्ति पाने का दिखाया मार्ग

    हम महात्मा जड़भरत के बारे में चर्चा कर रहे हैँ. जिनका जीवन हमें “मोह और आसक्ति से मुक्ति पाने की सीख देता है।”

    “बहुत समय पहले, एक महान राजा हुए – राजा भरत। राजा भरत परम भक्त थे, ईश्वर में पूरी तरह लीन रहते। उन्होंने कई वर्षों तक राजपाट चलाया, प्रजा का पालन किया। लेकिन फिर एक दिन उनके मन में वैराग्य जाग उठा और उन्होंने राज्य त्याग दिया और गंडक नदी के तट पर पुलह ऋषि के आश्रम में तपस्या करने लगे

    वहाँ वे रोज भगवान का ध्यान करते, मंत्रजप करते, एकाग्र चित्त से साधना करते। जिससे उनका मन अब संसार से हटकर केवल भगवान में बस गया था।”

    एक दिन राजा भरत नदी के किनारे बैठे थे। तभी उन्होंने देखा – कि वहां एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई। और अचानक वहां पास ही एक शेर गरजा, हिरणी शेर की गर्जन सुन कर घबरा गई और छलांग लगाकर नदी पार करने की कोशिश करने लगी, और इसी कोशिश में उसका बच्चा नदी में गिर पड़ा। बेचारी हिरणी तो डर से प्राण त्याग बैठी।

    राजा भरत का हृदय इस दृश्य को देखकर पिघल गया। उन्होंने उस नन्हें हिरण शावक को उठाया और आश्रम में ले आए। बड़ी ममता से उसका पालन-पोषण करने लगे। और उसकी देखभाल में लग गए।

    धीरे-धीरे उनका मन भगवान से हटकर उस हिरण में अटक गया। और यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। जब मृत्यु का समय आया, तो उस समय भी वो हिरण की याद में ही डूबे थे । और फिर कहते हैं ना , जैसा मन, वैसा अगला जन्म। राजा भरत का पुनर्जन्म हुआ – एक हिरण के रूप में।”

    “लेकिन चमत्कार देखिए – हिरण रूप में भी उन्हें पिछले जन्म की सारी बातें याद थी । उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने भक्ति छोड़कर हिरण के बच्चे के मोह में पड़ कर गलती की। अब उन्होंने निश्चय किया कि इस जन्म में किसी से कोई मोह नहीं करेंगे। अब वो जंगलों में रहते, संतों के पास जाते और मन ही मन भगवान का स्मरण करते रहे।

    फिर जब मृत्यु हुई, तो उनका अगला जन्म हुआ – एक ब्राह्मण परिवार में। यही बने – महात्मा जड़भरत।”

    “जड़भरत जन्म से ही अलग स्वभाव के थे। वे सब जानते थे कि मोह इंसान को बांध देता है। इसलिए उन्होंने तय किया कि वे संसार से दूरी बनाएँगे। लोग उन्हें पागल समझते थे क्योंकि वे साधारण कपड़े पहनते, मैले-कुचैले रहते, शरीर पर ध्यान नहीं देते थे और जो कुछ भी खाने को मिल जाए, वही खा लेते थे ।

    महात्मा जड़भरत सम्मान को विष मानते थे और अपमान को अमृत। वो हमेशा मौन रहते, किसी से ज्यादा बात नहीं करते। आत्मा का चिंतन ही उनका लक्ष्य था। इसी कारण उन्हें लोग ‘जड़’ कहते थे – यानी जैसे कोई निर्जीव हों। लेकिन अंदर से वे एक महायोगी थे।”

    एक बार की बात है जब कुछ डाकुओं ने उन्हें पकड़ लिया। डाकुओं का समूह देवी भद्रकाली को उनकी बलि देना चाहता था जड़भरत स्वस्थ और बलवान थे, तो वो उन्हें बलि चढ़ाने के लिए अपने साथ ले गए। डाकूओं ने महात्मा को स्नान कराया, सजाया- धजाया, फूलों की माला पहनाई और फिर देवी को बलि अर्पित करने के लिए तलवार उठा ली.

    लेकिन देखिए एक संत का तेज किसे कहते हैं – जैसे ही उन्होंने तलवार उठाई तो तभी देवी की मूर्ति जाग उठी। भयंकर रूप धारण कर देवी प्रकट हुईं और डाकुओं का संहार कर दिया। जड़भरत शांत बैठे रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। क्योकि वो जानते थे – कि आत्मा अविनाशी है, उसे कोई मार नहीं सकता।”

    इसी के साथ उनकी एक और घटना प्रसिद्ध है।एक बार सिंधु देश के राजा रहूगण अपने गुरु कपिल मुनि से मिलने जा रहे थे। और जब रास्ते में पालकी ढोने वालों को एक आदमी कम पड़ा। तो तभी उन्होंने देखा कि जड़भरत उधर से ही निकल रहे थे तो पालकी ढोने वालो ने उन्हें पकड़ लिया और वे ज़ोर ज़बरदस्ती से उनसे पालकी उठवाने लगे। मरता क्या नहीं करता, जड़भरत उनके साथ पालकी उठा कर चल दिए लेकिन वे चलते समय इस बात का ध्यान रख रहे थे कि कहीं कोई चींटी उनके पैरों तले न दब जाए। इसलिए वो धीरे-धीरे चल रहे थे । जिसके कारण पालकी डगमगाने लगी। ये देख राजा रहूगण गुस्से में बोले – ‘अरे मूर्ख! ठीक से पालकी क्यों नहीं उठा रहा?’

    जड़भरत मुस्कुराए और बोले – ‘राजन, मैं कौन होता हूँ पालकी ढ़ोने वाला ? पालकी तो यह मेरा नश्वर शरीर उठा रहा है। मैं तो आत्मा हूँ, आत्मा न पालकी उठाती है, न थकती है, न दुख पाती है।’

    उनकी वाणी सुनकर राजा रहूगण का अहंकार चूर हो गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं, ये ज़रूर कोई महात्मा हैं। राजा ने बिना देर किये महात्मा के पैरो में गिरकर माफ़ी माँगी और उनसे आत्मज्ञान की शिक्षा ली।”

    महात्मा जड़भरत की कथा हमें यही सिखाती है – कि जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है किसी भी चीज़ का ‘मोह और उसकी लत, हिरण के कारण एक महान राजा को पशु योनि में जन्म लेना पड़ा। लेकिन फिर सजग होकर उस आत्मा ने एक महान योगी के रूप में जन्म लिया और मोह का त्याग कर आत्मा चिंतन किया और भगवान का ध्यान किया जिससे उन्हें मोक्ष मिला,

    साथियों सच्चा आनंद न धन में है, न मान-सम्मान में। सच्चा सुख है – आत्मा का चिंतन, भगवान का स्मरण और मोह-मुक्त जीवन में। इसलिए संत कहते हैं – अपमान को अमृत मानो, सम्मान को विष समझो। और हर हाल में भगवान का नाम लो। यही है जीवन की सच्ची साधना।” तो ये थी महात्मा जड़भरत की जीवन कहानी.

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