संत तिरुवल्लुवर – तमिल वेद के रचयिता

    भारत के महान संतों की चर्चा में इनका नाम सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सम्मान और श्रद्धा से लिया जाता है।

    अब आप सोच रहे होंगे – ये तिरुवल्लुवर कौन थे? और क्यों उनका नाम आज भी लोग इतने प्यार और आदर से लेते हैं? आइए इनके जीवन सफर को जानते हैँ.

    करीब दो हज़ार साल पहले। दक्षिण भारत की धरती पर, एक छोटे से कस्बे मायलापुर में एक बच्चे का जन्म हुआ। और उस बच्चे का नाम रखा गया – वल्लुवर। और जिस मयलापुर नमक कस्बे में वल्लुवर का जन्म हुआ था वो आज चेन्नई का एक छोटा सा हिस्सा है

    वल्लुवर का परिवार साधारण था। उनके पिता ब्राह्मण थे और माँ दलित समुदाय से थीं। इसी वजह से समाज ने उन्हें नीच समझा और उनके सामने ऊँच-नीच की दीवारें खड़ी करने कि कोशिश की।

    लेकिन, जिस बच्चे को लोग छोटा और नीच समझते थे, वही आगे चलकर इंसानियत का सबसे बड़ा शिक्षक बन गया।

    वल्लुवर का जीवन किसी राजमहल में नहीं, बल्कि एक साधारण से घर में एकदम सादगी के साथ बीता था । उनका विवाह भी एक सरल, धर्मपरायण और पतिव्रता स्त्री वासुकी से हुआ था।

    दोनों का जीवन बहुत ही सीधा-साधा था। न कोई धन-दौलत, न राजसी वैभव। उनके पास था तो बस – एक छोटा-सा घर, रोजमर्रा का सादा जीवन और दोनों के बीच का गहरा प्रेम। सादगी भरा जीवन जीते हुए वल्लुवर ने गहरी बातें सीखी और फिर उन्होंने अपनी एक अमर किताब तिरुक्कुरल लिखा।

    कहा जाता है कि वल्लुवर अपनी पत्नी के गुणों से बहुत ही खुश रहते थे। क्योंकि वासुकी हर काम धैर्य और श्रद्धा से करती थीं। वल्लुवर अक्सर उनसे कहते – “अगर हर पत्नी ऐसी हो, तो हर घर मंदिर बन जाए।”

    – एक बार वल्लुवर ने वासुकी से कहा, “तुम पानी की हांडी उठाकर तब तक पकड़े रहो, जब तक मैं लौटकर न आऊँ।” सोचिए, कितना मुश्किल काम है! भारी हांडी हाथ में उठाकर देर तक खड़े रहना।

    लेकिन वासुकी ने बिना कुछ कहे वैसा ही किया जैसा वल्लुवर ने कहा था। फिर जब थोड़ी देर बाद वल्लुवर वापस घर लौटे, तो उन्होंने देखा कि वासुकी अब भी उसी तरह खड़ी हैं।

    ये देखकर वल्लुवर भावुक हो गए। उन्होंने कहा – “यही है सच्चा धर्म – बिना बहस, बिना सवाल, सिर्फ प्रेम और सेवा से निभाना।धन्य है | ऐसे ही प्रेम से दोनों का जीवन अच्छा बीत रहा था कि एक दिन अचानक वासुकि का निधन हो गया और उसके निधन के बाद वल्लुवर और भी गहरे चिंतन और वैराग्य में डूब गए।

    उनकी महान रचना तिरुक्कुरल है. कुरल” का मतलब है – छोटी-सी दो पंक्तियों की कविता, लेकिन उनमें जीवन का बहुत बड़ा ज्ञान छिपा होता है। ये कोई साधारण किताब नहीं है। इस किताब को “तमिल वेद” कहा जाता है। मतलब जैसे संस्कृत में वेद हैं, वैसे ही तमिल समाज में कुरल को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। इस किताब में कुल 1330 श्लोक हैं। और हर श्लोक सिर्फ दो पंक्तियों में जीवन का पूरा सार बता देता है। अब ज़रा सोचिये की जिस किताब को आज तमिल वेद कहा जाता है उस किताब को जब वल्लुवर ने विद्वानों के सामने रखी, तो कई पंडितों ने इसे मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा – “ये शास्त्र लिखने का अधिकार किसे है? ये तो नीची जाति का आदमी है!”

    ये भी सच है कि सच्चाई को कौन ही दबा के रख सकता है? वल्लुवर ने कहा – “ठीक है, मेरी किताब की परीक्षा की जाए, सभी परीक्षा के लिए मान गए और मदुरई के एक मंदिर के तालाब में नाव रखी गई। नाव के एक हिस्से में सारे पंडित बैठे, और दूसरे हिस्से में वल्लुवर ने अपनी किताब कुरल रख दी।

    तब हुआ क्या?

    जहाँ पंडित बैठे थे, नाव का वो हिस्सा डूबने लगा। और जहाँ कुरल रखा था, वो हिस्सा तैरता रहा। तब सबको एक बात समझ आ गई – कि ये कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि सच्चे ज्ञान का खज़ाना है। तभी से वल्लुवर और उनका कुरल सबके लिए आदरणीय हो गए।

    वल्लुवर ने कहा कि सत्य सबसे बड़ा धर्म है, क्योंकि असत्य पर खड़ा कोई भी जीवन टिक नहीं सकता। उनका मानना था कि जो दूसरों की भलाई करता है, वही सच्चा धनवान है, क्योंकि असली धन पैसा नहीं बल्कि दूसरों की भलाई करना है। उन्होंने प्रेम को फूल से भी अधिक कोमल बताया और कहा कि उसका असली आनंद केवल वही पा सकता है, जिसका हृदय निर्मल हो। और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने समझाया कि जन्म से सभी लोग एक समान होते हैं, अंतर अगर बनता है तो वो केवल कर्मों से बनता है। सोचकर देखिए, ये बातें उन्होंने हजारों साल पहले कही थीं, लेकिन आज भी ये उतनी ही सच और प्रासंगिक हैँ - यानि हमारे समाज पर आज भी लागु होती हैं।

    वल्लुवर का जीवन-दर्शन बहुत ही सरल और साफ था। उनका मानना था कि असली दौलत धन-दौलत नहीं बल्कि सदाचार यानि , अच्छा आचरण रखना, अच्छे कर्म करना, ईमानदारी से जीवन जीना, और दुसरो के काम आना है। वे कहते थे कि इंसान की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म से होती है। उनका विश्वास था कि जो व्यक्ति अपने मन पर काबू पा लेता है, वही असली सुख और स्वर्ग को प्राप्त करता है। उन्होंने ये भी सिखाया है कि असत्य और अन्याय से मिले लाखों फायदे भी छोड़ देने चाहिए, क्योंकि सच्चाई ही जीवन की नींव है। सबसे खास बात यह थी कि वल्लुवर ने हमेशा गहरी बातें इतनी आसान भाषा में कहीं कि आम आदमी भी उन्हें आसानी से समझ सकता है और अपने जीवन में उतार सकता है.

    वल्लुवर का जीवन सहनशीलता की मिसाल था। उन्होंने कहा – “जैसे सोना आग में तपकर और ज्यादा चमकता है, वैसे ही संत अपने तप और दुखों को सहकर और भी महान बनता है।” वो किसी एक धर्म या सम्प्रदाय तक सीमित नहीं रहे।बल्कि वे जनता के संत थे। उनकी नज़र में – भगवान हर जगह है। गरीब में भी, अमीर में भी, जड़ में भी, चेतन में भी।

    आज भी उनकी समाधि चेन्नई के मायलापुर में है। लोग वहाँ श्रद्धा से जाते हैं और उन्हें श्रद्धा भाव से नमन करते हैं। असल में यह पूजा एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की है जो कहता है – मानवता सबसे बड़ा धर्म है।

    दोस्तों, सोचिए – यह बातें हजारों साल पहले कही गई थीं। और आज भी जब हम समाज में जात-पात, ऊँच-नीच, अन्याय और हिंसा देखते हैं, तो लगता है – कि वल्लुवर का कुरल कितना जरूरी है। उनकी एक-एक सीख आज भी हमारी राहों को रोशन करती है।

    संत तिरुवल्लुवर की कथा हमें यही सिखाती है कि एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाला वह बच्चा, जिसे समाज ने हीन समझा, वो आगे चलकर पूरी मानवता के लिए महान प्रेरणा बन गया। उसने यह दिखा दिया कि इंसान की ऊँचाई उसके कर्मों से तय होती है, ना कि जन्म से। और याद रखें इस संसार में प्रेम सबसे बड़ा बल है, सत्य सबसे बड़ी ढाल है, दया सबसे बड़ी संपत्ति है और सदाचार ही असली धर्म है।

    जब भी जीवन में कठिनाई आए, जब भी लगे दुख बहुत बड़ा है, तब संत वल्लुवर की इस सीख को याद कर लेना –

    दुख चाहे कितना भी बड़ा हो, सहन करो, क्योंकि दुख ही हमे निखार कर पत्थर से हीरा बनता है” और जब भी किसी की भलाई करने का मौका मिले, तो उसे बिल्कुल मत छोड़ना।

    क्योंकि – दूसरों की भलाई ही असली धन है।”

    यही है संत तिरुवल्लुवर का संदेश –

    एक ऐसा संदेश जो हजारों साल बाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उस दिन था जब उन्होंने कुरल लिखा था।

    धन्यवाद |

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