Drishya Dharma
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तोता और उल्लू की कुर्सी
नमस्कार दोस्तों…
हमारी प्रेरक कहानियों का एक ही उद्देश्य रहा है— जीवन की गहरी बातों को सहज और सरल ढंग से समझाना। तोता और उल्लू की कुर्सी, कथा बताती है कि सत्ता पाने का असली आधार क्या है— बोलने की मिठास, या जनता की नज़रों में विश्वसनीयता।
एक घना जंगल था। उसके बीचों-बीच एक विशाल पीपल का पेड़ खड़ा था। वहीं जंगल के पक्षियों की सभा लगती थी। कई वर्षों से सभा का नेतृत्व उल्लू कर रहा था। उल्लू रात को देख सकता था, इसलिए समझदार माना जाता था। लेकिन उसकी एक कमी थी— वह दिन में सोता रहता और बहुत कम पक्षियों से मिलता। इसी पेड़ पर एक तोता भी रहता था। तोते की आवाज़ मीठी थी, और वह दिनभर बोलता-बतियाता रहता। धीरे-धीरे तोते ने पक्षियों के दिल जीत लिए।
एक दिन कुछ चिड़ियों ने कहा— “उल्लू महाराज, आप तो अच्छे हैं, लेकिन आपसे मिलना मुश्किल है। दिनभर तो सोते रहते हैं। हमें तो ऐसा नेता चाहिए, जो हर समय हमारे बीच हो।” तोते ने तुरंत मौका पकड़ा। वह बोला— “मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। सुबह-शाम बातें करता हूँ, गीत गाता हूँ, समस्याएँ सुनता हूँ। अगर तुम चाहो, तो मुझे अपना नेता बना लो।” चहकते-चिड़ियाँ बोलीं—“हाँ, हाँ! यही चाहिए हमें।”
तोते ने रोज़ सभा में मीठी-मीठी बातें करनी शुरू कीं। “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, हम सब बराबर हैं… हम सब मिलकर एक नया जंगल बनाएँगे।” उसकी भाषा इतनी प्यारी थी कि कबूतर, मैना, गौरैया सब उसके मुरीद हो गए। धीरे-धीरे सभा में उल्लू की जगह तोते का नाम गूंजने लगा। उल्लू ने यह सब देखा। वह जानता था कि तोता मीठा बोलता है, पर अनुभवहीन है। फिर भी वह चुप रहा।
कुछ ही महीनों बाद, जंगल पर संकट आया। पास के इंसानों ने जंगल काटना शुरू कर दिया।पेड़ों की शाखाएँ गिरने लगीं, पक्षियों के घोंसले टूट गए। सब पक्षी भागकर सभा में पहुँचे। तोता घबराया। वह बोला— डरो मत, सब ठीक हो जाएगा। हम सब गाएँगे, इंसान पिघल जाएँगे।”
पक्षियों ने उसके कहे अनुसार इंसानों के सामने शोर मचाया और गीत गाया। लेकिन इंसान तो न रुके, उल्टे और पेड़ काटने लगे। पक्षी हड़बड़ा गए। तोता चुप पड़ गया। तभी उल्लू ने अपनी घोर आवाज़ में कहा— सिर्फ मीठी बातें काफी नहीं। संकट का सामना रणनीति से होता है। इंसान दिन में काटते हैं, हमें रात में उनके औज़ार छुपाने होंगे। सिर्फ गीत नहीं, योजना भी चाहिए।”
पक्षियों ने उल्लू की बात मानी। रातभर सबने मिलकर इंसानों के औज़ार दूर फेंक दिए। सुबह इंसान बिना औज़ारों के लौट गए और पेड़ बच गया।
इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है—नेता केवल मीठा बोलकर जनता को जीत तो सकता है, लेकिन असली नेतृत्व तभी साबित होता है, जब संकट में सही योजना और अनुभव से जनता का भला किया जाए। सत्ता की कुर्सी सिर्फ आवाज़ और वादों से नहीं मिलती, बल्कि जनता की रक्षा और विश्वास से टिकती है।”
धन्यवाद।
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