Drishya Dharma
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कैसे हुई शक्तिपठों की उत्पत्ति
आपने कभी सोचा है कि भारतवर्ष के कोने-कोने में माता के इतने रूप क्यों पूजे जाते हैं? क्यों हर राज्य, हर नगर, हर तीर्थ में ‘माँ’ के मंदिर हैं, जहाँ लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं? इसका रहस्य छिपा है— सती और शिव की महाकथा में। सती और शक्तिपीठ के उत्पत्ति की कथा बहुत ही प्राचीन समय की है। जब सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु, रूद्र स्वरूप भगवान शिव और ब्रह्मा जी द्वारा यह सृष्टि चलाई जा रही थी। और उस समय में ब्रह्मा के पुत्र थे प्रजापति दक्ष — । जिन्हे ब्रह्मा द्वारा प्रजापति की उपाधि दी गई थी उन्ही प्रजापति दक्ष की पुत्री थी देवी सती।
ये प्राचीन समय की बात है।ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष ने माँ आदिशक्ति की घोर तपस्या कर उनसे अपने घर पुत्री के रूप में अवतरतीत होने का वरदान माँगा और उनकी प्रार्थना स्वीकार कर माँ आदिशक्ति ने सती के रूप में दक्ष के घर जन्म लिया। सती का मन बचपन से ही महादेव पर आसक्त था। घोर तपस्या कर उन्होंने शिव को पति के रूप में प्राप्त किया।लेकिन दक्ष को यह विवाह कभी स्वीकार नहीं था।
सती के विवाह के बाद एक दिन दक्ष ने भव्य यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषियों और प्रजापतियों को बुलाया, लेकिन जान-बूझकर अपने दामाद — महादेव को आमंत्रित नहीं किया। जब सती ने सुना, तो वे व्याकुल हो उठीं।
उन्होंने शिव से कहा —
सती (नम्र स्वर में):
“स्वामी, पिता ने यज्ञ रखा है। मैं वहाँ जाना चाहती हूँ। वो मेरा घर है, पिता जी मुझसे नाराज़ है तो क्या वो मेरा भी तो घर है न मुझे यज्ञ में जाना है
शिव (गंभीर स्वर में):उन्हें समझाते हुए कहा “देवी, यज्ञ में बुलावा नहीं आया है। और बिना आमंत्रण जाना अपमानजनक होगा। वहाँ तुम्हें और मुझे केवल तिरस्कार मिलेगा।”
सती ने भगवन शिव की एक न सुनी और वो (भावुक होकर):बोली
“परंतु मैं उनकी पुत्री हूँ, पुत्री को पिता के घर जाने के लिए बुलावे की आवश्यकता नहीं होती।
मैं जाऊँगी, और देखूँगी कि क्या पिता जी सचमुच इतना कठोर हो गए हैं।”
शिव ने रोकने का प्रयास किया, पर सती ने भी अपना निच्य दृढ़ कर लिया था. उन्होंने बच्चों की भांति ज़िद पकड़ ली थी. जिसके आगे भगवन शिव मजबूर हो गए और देवी सती अकेली ही यज्ञ में पहुँच गईं। देवी सती पुरे रास्ते इसी सोच में डूबी रही की उन्हें देख उनके पिता का हृदय पिघल जायेगा और वो उन्हें देखते ही अपने सीने से लगा लेंगे. लेकिन जब सती यज्ञस्थल पर पहुँचीं, तो सभी की दृष्टि उनकी ओर गई। परंतु वहाँ उनके स्वागत के बजाय, अपमान के शब्द गूँज उठे। दक्ष ने सती को देख कर कहा
दक्ष (कटु स्वर में, सबके सामने):
“यह देखो! कौन आई है?
शिव-पति वाली ये सती! उस तपस्वी भिक्षुक को हमने अपने यज्ञ में बुलाना उचित नहीं समझा। तो उसने अपनी पत्नी को ही भिक्षा मांगने के लिए भेज दिया। भस्म-धारी, व्याघ्रचर्म पहनने वाला, प्रेतों के बीच रहने वाला… अघोरी है वो… तुम्हारा पति !” यह सुनकर सती का हृदय चीर गया।अपने पति के लिए अपने ही पिता के मुख से ऐसे शब्द सुन कर उनके मन को बहुत ठेस पहुंची और अपने पति के लिए अपमान भरे दक्ष के कटु शब्दों से उनकी आँखों में आंसू और मन में ये दुःख था की उन्होंने अपने पति भगवन शिव की बात क्यों नहीं मानी आखिर उनकी ज़िद शिव के अपमान का कारण बने है यही कारन था की उनकी आँखों में आंसू और मन के भीतर क्रोध की अग्नि भड़कने लगी उन्होंने अपने पिता को चेतावनी देते हुए कहा
सती (आँखों में आँसू, दृढ़ स्वर में):
“पिता जी ! आप भूल कर रहे हैं।
जिसे आप तिरस्कृत कह रहे हैं, वो देवों के देव महादेव हैं — त्रिलोक के स्वामी हैं।
आपने मेरे ईश्वर, मेरे प्राणप्रिय स्वामी का अपमान किया है। ऐसे पिता के घर में जन्म लेना ही मुझे अब अभिशाप लगता है। मैं इस शरीर को, जो आपसे प्राप्त हुआ है, अब और नहीं रख सकती।” ये मेरी भूल थी की अपने स्वामी के मना करने के बाद भी मैं पिता के मोह में यहाँ चली आयी लेकिन मैं गलत थी… हे स्वामी मुझे क्षमा करना आज मेरे कारण आपका अपमान हुआ है इतना कहकर सती ने यज्ञ अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया। और ये देख वहाँ खड़े सभी लोग सन्न रह गए. चारो तरफ सन्नाटा छा गया. सती की माता-बहनें फुट-फुट कर रोने लगीं. चारो तरफ मनो हाहाकार मच गया और यह समाचार जब कैलाश पहुँचा, तो महादेव शोक से व्याकुल हो उठे।और वो क्रोध से भरे स्वरों में बोले “हे सती! हे प्राणेश्वरी! आज यह ब्रह्मांड तुम्हारे वियोग का साक्षी बनेगा। दक्ष! तुम्हारे इस अपराध का दंड अब तुम्हें अवश्य मिलेगा।”
इतना कहकर उन्होंने क्रोध और शोक में विकराल रूप धारण कर लिया और फिर शुरू हुआ शिव तांडव, सृष्टि उथल-पुथल होने लगी। और शिव के मुख से शोक उनकी आँखों से अग्निज्वाला फूट पड़ी। भयावह गर्जना के साथ उन्होंने अपनी जटा पटकी। जिससे उत्पन्न हुए — वीरभद्र और भयंकर महाकाली। शिव ने उन्हें आदेश दिया
शिव (आदेशात्मक स्वर में):
“वीरभद्र! महाकाली!
जाओ, दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दो। उस अधर्मी का मस्तक काटकर उसके जीवन का अंत कर दो और जो भी तुम्हारे रस्ते में आये उसका भी सर्वनाश कर दो।”
वीरभद्र और महाकाली (एक स्वर में):
“जै हो, नाथ! आपके आदेश का पालन होगा।” वे यज्ञस्थल की ओर दौड़े। तभी वहाँ हाहाकार मच गया। यज्ञ वेदी ध्वस्त हो गई। देवता भयभीत होकर भागने लगे। और वीरभद्र ने दक्ष का मस्तक काट दिया। लेकिन दक्ष के वध के बाद भी महादेव का शोक शांत नहीं हुआ। वे सती के जले हुए शरीर को अपने हाथों में उठाकर तीनों लोकों में भटकने लगे। जिसके कारण संपूर्ण ब्रह्मांड में असंतुलन छा गया। देवता घबराकर भगवान विष्णु जी के पास पहुँचे। और त्राहि त्राहि करने लगे। और बोले
देवता:
“प्रभु, यदि महादेव का क्रोध शांत न हुआ तो सृष्टि नष्ट हो जाएगी। कुछ कीजिए।”
विष्णु ने उनकी पुकार सुन (शांत स्वर में):कहा
“शक्ति और शिव अविभाज्य हैं। परंतु अब सृष्टि की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि शक्ति अलग-अलग रूपों में धरा पर प्रतिष्ठित हों।” तब उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया। चक्र ने सती के शरीर को अनेक टुकड़ों में विभक्त कर दिया।
जहाँ-जहाँ माँ के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहाँ-वहाँ शक्ति पीठों की स्थापना हुई। शास्त्रों में कहीं 51, कहीं 52, कहीं 108 शक्ति पीठों का वर्णन है। लेकिन सर्वमान्य परंपरा में 51 शक्ति पीठ स्वीकार किए जाते हैं। इनका संबंध संस्कृत वर्णमाला से भी है। ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक — हर अक्षर एक शक्ति पीठ का प्रतीक है। इसीलिए इन्हें वर्णमाला पीठ भी कहा गया है।
जय माता दी 🙏
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