द्वारका धाम

    “ मथुरा छोड़ भगवान कृष्ण क्यों गए द्वारका”

    द्वारका, भगवान श्रीकृष्ण की नगरी। यह वह स्थान है जहाँ सागर की लहरें भी “ भगवान श्रीकृष्ण” का गीत गाती हैं।

    गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में, अरब सागर के किनारे बसा है द्वारका धाम। यह जगह भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित है।

    यहाँ की हवा में नमक की हल्की खुशबू है, और हर ओर सुनाई देती है — “जय द्वारकाधीश कि ध्वनि!”

    जैसे ही आप द्वारका के पास पहुंचेंगे तो दूर से समुद्र की लहरों के साथ आपको नज़र आएगा ऊँचा, सुंदर मंदिर —

    द्वारकाधीश मंदिर, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हैं।

    कहानी में आगे बढ़ने से पहले आपको याद रखना है की द्वारिका पहुंचना अब मुश्किल नहीं बल्कि बहुत आसान हो गया है अगर आप द्वारका धाम जाने का विचार कर रहे हैं, तो यहां के लिए by रोड , ट्रैन और एयर सर्विस – तीनों सुविधाएं है द्वारका का अपना रेलवे स्टेशन है — “द्वारका जंक्शन”, जहाँ अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, वडोदरा और दिल्ली से सीधी ट्रेनें आती हैं। और यहाँ का सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट है जामनगर एयरपोर्ट, जो द्वारका से करीब 130 किलोमीटर दूर है। जामनगर से टैक्सी, बसें और प्राइवेट वाहन आसानी से मिल जाते हैं। अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहें, तो अहमदाबाद से द्वारका की दूरी लगभग 450 किलोमीटर है, और रास्ते में जामनगर, पोरबंदर और ओखा जैसे सुंदर शहर आते हैं।

    अब आप सोच रहे होंगे — आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़कर समुद्र किनारे द्वारका नगरी क्यों बसाई?

    तो चलिए अब हम आपको बताते हैं इसकी पूरी कहानी।

    कहते हैं जब श्रीकृष्ण मथुरा में थे, तब वहाँ का राजा कंस बहुत अत्याचारी था। श्रीकृष्ण ने उसे मारकर मथुरा को उसके अत्याचार से तो मुक्त कर दिया था, लेकिन इसके बाद जरासंध नामक राजा — जो कंस का ससुर था — बार-बार मथुरा पर आक्रमण करने लगा। कहते हैं, उसने 17 बार मथुरा पर हमला किया, और हर बार श्रीकृष्ण ने अपने लोगों की रक्षा की। लेकिन श्रीकृष्ण समझ गए कि जरासंध का क्रोध कभी खत्म नहीं होगा। अगर वे मथुरा में रहेंगे, तो यहाँ के सभी बृजवासीयों की जान को हमेशा खतरा बना रहेगा।

    तब श्रीकृष्ण ने निर्णय लिया कि वे अपने लोगों को एक सुरक्षित जगह पर बसाएँगे — जहाँ शांति हो, सुरक्षा हो, और समुद्र उनका रक्षक बने। उन्होंने समुद्र से कहा — “हे सागर देव, मुझे और मेरे लोगों को एक सुरक्षित स्थान दो।” समुद्र देव ने कहा — “भगवान, मैं आपको अपना कुछ भाग देता हूँ, आप वहाँ एक नया नगर बसाइए।” और फिर उसी समुद्र तट पर श्रीकृष्ण ने बसाई — दिव्य नगरी द्वारका।

    कहा जाता है, यह नगर स्वर्ण और रत्नों से बना था। यह सात मंज़िला था, और चारों ओर सागर लहरें मारता था।

    यहाँ के दरवाज़े इतने बड़े थे कि नाम पड़ा — “द्वार का नगर”, यानी द्वारका।

    यहाँ एक और कहानी जुड़ी है, द्वारका चार धामों में से एक क्यों है। चार धामों की स्थापना आदि शंकराचार्य जी ने की थी। उन्होंने देश के चार कोनों में चार धाम बनाये — उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में पुरी, और पश्चिम में द्वारका। ये चारों मिलकर बनते हैं “मोक्ष के द्वार” — जहाँ जाने से आत्मा को शांति मिलती है। चार धामों में द्वारका को इसलिए चुना गया क्योंकि यह भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की भूमि है, जहाँ उन्होंने धर्म की स्थापना की और जीवन का संदेश दिया। इसलिए इसे कहा गया — “मुक्ति का पश्चिमी द्वार।”

    द्वारका का सबसे प्रसिद्ध स्थल है — द्वारकाधीश मंदिर। यह मंदिर 2,500 साल से भी पुराना है। इसका निर्माण श्रीकृष्ण के पोते वज्रनाभ ने करवाया था। मंदिर के ऊँचे शिखर पर लगभग 50 मीटर ऊँचा केसरिया झंडा लहराता है। यह झंडा दिन में पाँच बार बदला जाता है, और हर बार हज़ारों भक्त इसे देखने आते हैं।

    मंदिर के अंदर जब आप प्रवेश करते हैं, तो सामने भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति है — चार भुजाओं वाली, दिव्य और मुस्कुराती हुई। भक्त जैसे ही भगवान को देखते हैं, उनके होंठों पर अपने आप निकलता है — “जय द्वारकाधीश! जय श्रीकृष्ण!” द्वारका श्रीकृष्ण से जुड़ी कई कथाओं का साक्षी रहा है। और उनमे से एक सबसे प्यारी कथा — सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता की है। जिसने संसार को सच्ची मित्रता क्या होती है ये सिखाया।

    सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे। एक दिन जब पत्नी के बार-बार कहने पर उन्होंने सोचा कि “चलो श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका चलते हैं।” तो उनकी पत्नी ने कहा — “इतने दिन बाद आप अपने मित्र से मिलने जा रहे हैं, खाली हाथ जायेंगे क्या?”

    सुदामा जी की पत्नी ने उन्हें 3 मुठी चावल दिए और कहा कि ये भेंट के रूप में आप अपने मित्र कृष्णा को देना।

    सुदामा ठहरे सीधे-साधे इंसान। पत्नी के दिए चावल की पोटली लेकर वो द्वारका की ओर चल दिए।

    जब वे द्वारका पहुँचे, उन्हें महल के द्वारपाल ने द्वार पर ही रोक लिया। और जब उनसे उनका परिचय पूछा गया, तो सुदामा ने कहा — “मुझे कृष्णा से मिलना है। जाकर कहना कि उससे मिलने उसका बचपन का मित्र सुदामा आया है।” सुदामा फटी धोती पहने थे, न तन पर अंगोछा था और न पाँव में चप्पल। उनकी दयनीय हालत को देख सब उन पर हँसने लगे।

    लेकिन जब द्वारपाल ने यह बात श्रीकृष्ण को बताई, तो सुदामा का नाम सुनते ही कृष्ण अपना आसन छोड़ खुद दरवाज़े तक दौड़कर आए, और उन्होंने अपने बचपन के मित्र सुदामा को गले लगा लिया और उन्हें अपने साथ महल के अंदर ले गए और अपने सिंहासन पर बैठाया। कहा जाता है, श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से सुदामा के पैर धोए।

    उन्होंने अपने मित्र का मान रखा। और भेंट रूपी चावल के बदले श्रीकृष्ण ने सुदामा को पृथ्वी लोक का वैभव और स्वर्गलोक सुदामा के नाम कर दिया। और इसके बाद जब सुदामा अपने गाँव लौटे, तो उनका घर एक सुंदर महल में बदल चुका था। उस दिन श्रीकृष्ण ने हमें सिखाया — सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी का कोई फर्क नहीं होता।

    द्वारका में एक और बहुत सुंदर मंदिर है — रुक्मिणी देवी मंदिर। रुक्मिणी जी, श्रीकृष्ण की पत्नी थीं। कहा जाता है, एक बार श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी ऋषि दुर्वासा के यहाँ भोजन के लिए गए। रास्ते में रुक्मिणी जी को प्यास लगी, तो उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा – “मुझे पानी चाहिए।” श्रीकृष्ण ने धरती पर पैर मारा, और वहीं से गंगा जल की धारा निकली और रुक्मिणी जी ने पानी पी लिया।

    लेकिन ऋषि दुर्वासा को यह बात पसंद नहीं आई, क्योंकि उन्होंने पहले अनुमति नहीं ली थी। क्रोध में उन्होंने कहा – “तुम दोनों एक साथ नहीं रहोगे।” तभी से रुक्मिणी जी का मंदिर द्वारका से थोड़ी दूरी पर है। लोग आज भी दोनों मंदिरों के दर्शन साथ करते हैं।

    कहते हैं, जब श्रीकृष्ण ने पृथ्वी से विदा ली, तो समुद्र ने आकर पूरी द्वारका नगरी को अपने भीतर समा लिया। आज भी वैज्ञानिकों ने समुद्र के नीचे पुरानी द्वारका के अवशेष पाए हैं — दीवारें, रास्ते, और मंदिरों के चिह्न। माना जाता हैं कि समुद्र की गहराइयों में आज भी भगवान श्रीकृष्ण की पुरानी नगरी बसी हुई है।

    आज की द्वारका एक सुंदर और शांत जगह है। मंदिर के सामने से ही अरब सागर दिखाई देता है। लहरें आती हैं, किनारे से टकराती हैं, और जैसे भगवान के चरणों में प्रणाम करती हैं। सुबह की आरती का दृश्य बहुत अद्भुत होता है। सूरज की पहली किरण मंदिर के शिखर पर पड़ती है, शंख बजता है, और हवा में फैल जाती है “जय श्रीकृष्ण!” की ध्वनि।।

    और जब शाम को दीप जलते हैं तो मंदिर सोने की तरह चमकने लगता है, और जब समुद्र की लहरों पर हज़ारो दीपक एक साथ झिलमिलाते है तो वो पल सच में मन को छू लेता है.

    यहाँ की कुछ विशेष जानकारी में सबसे पहले नंबर पर है मंगला आरती यह दिन की सबसे पहली पूजा होती है — बहुत सुबह, जो लगभग सुबह 6 बजे होती है । माना जाता है कि जैसे ही सूरज की पहली किरण भगवान श्रीकृष्ण के शिखर पर पड़ती है, वैसे ही भगवान को जगाया जाता है। शंख बजते हैं, घंटियाँ गूँजती हैं, और पुजारी भगवान को “मंगला आरती” से जगाते हैं।

    दूसरे नंबर पर आती है श्रृंगार आरती जो (सुबह 7:30 से 8 बजे के बीच होती है ) इस समय भगवान को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। उनकी मूर्ति को फूलों से सजाया जाता है, और विशेष रूप से चंदन का लेप लगाया जाता है। भगवान को मोर पंख का मुकुट और पीतांबर धारण कराया जाता है।

    इसके बाद तीसरे नंबर पर आती है (राजभोग आरती जो दोपहर की मुख्य पूजा मानी जाती है ) दोपहर को भगवान को भोग लगाया जाता है — यानी भोजन अर्पित किया जाता है। भोजन में खीर, लड्डू, फल, माखन, मिश्री और अनेक व्यंजन होते हैं। इस समय मंदिर में बहुत सुंदर संगीत और शंखनाद होता है। और आरती के बाद भक्तो को प्रसाद मिलता है

    और फिर चौथे नंबर पर होती है संध्या आरती, शाम को सूरज ढलने के बाद यह आरती होती है। पूरा मंदिर दीपों से जगमगाता है, सागर की लहरों की आवाज़ भगवन के रास से भरपूर होकर उमड़ आती है — और माहौल एकदम दिव्य लगता है। कहा जाता है कि यह आरती भगवान के दिनभर की सेवा के बाद विश्राम का प्रतीक है।

    इसके बाद यहाँ होती है शयन आरती जो रात की अंतिम पूजा होती है रात में भगवान को विश्राम के लिए तैयार किया जाता है। उनके शयन कक्ष में सुगंधित फूल, चंदन और अगरबत्ती लगाई जाती है। फिर शयन आरती गाई जाती है — “श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी…” यह बहुत शांत, मन को छू लेने वाला क्षण होता है।

    चलिए अब हम आपको द्वारका की प्रमुख वार्षिक उत्सव और विशेष पूजा के बारे में बताते हैं

    द्वारका में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। मंदिर को सोने-चाँदी की सजावट से सजाया जाता है। रात 12 बजे भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है, शंख बजते हैं, नृत्य होता है, और भक्त झूम उठते हैं। पूरा शहर “जय कन्हैया लाल की” आवाज़ से गूंजता है।

    दूसरी है अन्नकूट और गोवर्धन पूजा दीवाली के अगले दिन, भगवान को 56 भोग चढ़ाए जाते हैं — इसे अन्नकूट कहा जाता है। इस दिन मंदिर में विभिन्न व्यंजन रखे जाते हैं, जो गोवर्धन पर्वत की तरह सजाए जाते हैं। कहा जाता है कि स्वयं श्रीकृष्ण उस दिन सब भक्तों का अन्न स्वीकार करते हैं।

    फिर आती है ध्वजारोहण (झंडा चढ़ाने की परंपरा) यह द्वारका की सबसे विशेष परंपरा है। द्वारकाधीश मंदिर की सबसे ऊँची चोटी पर ध्वजा (झंडा) दिन में पाँच बार बदला जाता है। हर बार नया झंडा चढ़ाने के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। यह झंडा 52 गज लंबा होता है — जो भगवान श्रीकृष्ण के 52 यदुवंशी कुलों का प्रतीक है।

    पुरी धाम की तरह द्वारका में भी एक छोटी रथ यात्रा निकाली जाती है। इसमें श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी की मूर्तियों को रथ पर बैठाकर भक्त पूरे शहर में घूमाते हैं। इसके साथ-साथ द्वारका में पूर्णिमा और होली भी बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। मंदिर में रंग-बिरंगी सजावट होती है, और समुद्र तट पर भक्त भजन करते हैं। माना जाता है कि द्वारका में होली खेलना — “भगवान के साथ आनंद बाँटने” जैसा है।

    दोस्तों श्री कृष्ण कहते हैं कि जीवन में प्रेम, सच्चाई और करुणा सबसे बड़ी पूजा हैं। साथ ही उन्होंने ये भी कहा हैं कि जीवन में हर भूमिका निभाओ, पर अपने मन को शांति और धर्म से जोड़कर रखो। उन्होंने ये भी कहा था — “कर्म करते रहो, फल की चिंता मत करो।” यही संदेश द्वारका की हर लहर हमें देती है।

    दोस्तों जो लोग busy scheduled के कारण द्वारिका नहीं जा पाते और अगर वो लोग द्वारिका मंदिर के दर्शन की अभिलाषा रखते हैं तो वो लोग दिव्य सनातन के द्वारा घर बैठे द्वारिका मंदिर में अपने नाम से अनुष्ठान या संकल्प करवा सकते हैं जिससे आपको द्वारिका धाम दर्शन यात्रा का पूरा फल मिलेगा और वो भी घर बैठे।

    जय श्रीकृष्ण!

    जय द्वारकाधीश!

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