श्राद्ध या पितृपक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराते है ?

    Shraddh Mein Kauvon Ko Bhojan Kyon Karate Hai | पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष में कौवों को पितरों का प्रतिक मानकर भोजन कराया जाता है। लेकिन भोजन कौए को ही क्यों दिया जाता है, इसका वर्णन हमे हमारे पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। हमारे धर्म ग्रंथों में इससे सम्बंधित 2 प्रसंगों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है।

    पहले प्रसंग के अनुसार मरूता नाम के राजा एक बार यज्ञ कर रहे थे। इसमें इंद्र सहित सभी देवता शामिल हुए। इसमें देवताओं का दुश्मन रवाना (कौए की तरह दिखने वाला एक पक्षी) भी यहां आ गया। फिर इंद्र ने मोर, कुबेर ने गिरगिट, वरुण ने श्वान और यम ने कौए का रूप धारण कर कर उसे भगाया और फिर मूल रूप में वापस लौट आए। उन्होंने अपनी जान की रक्षा करने के लिए कौए, गिरगिट और श्वान को वरदान भी दिया। यम ने कौए को वरदान दिया कि तुम्हें दिया भोजन पूर्वजों की आत्मा को भी शांत करेगा।

    दूसरे प्रसंग के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। त्रेता युग की घटना कुछ इस प्रकार हैं – जयंत ने कौऐ का रूप धर कर माता सीता को घायल कर दिया था। तब भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जयंत ने अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा।

    इसके अलावा गरुण पुराण में भी कौओं का जिक्र आया है। गरुड़ पुराण में बताया है कि कौएं यमराज के संदेश वाहक होते हैं। श्राद्ध पक्ष में कौएं घर-घर जाकर खाना ग्रहण करते हैं, इससे यमलोक में स्थित पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है।

    कौओं के संबंध में एक रोचक बात यह है की कौएं KHA की आवाज निकालते है। मूल रूप से KHA एक संस्कृत शब्द हैं। इसके कई अर्थ है – सूर्य, वायु, स्वर्ग, आसमान, पृथ्वी, ख़ुशी, ब्रह्म आदि।

    विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी कौओं का वर्णन मिलता है।

    ग्रीक माइथोलॉजी में रैवन (एक प्रकार का कौवा) को गुड लक का सिम्बल माना गया है। इसे गॉड का मैसेंजर कहा गया है। इसे दुनिया का निर्माण करने वालों में से एक बताया गया है।

    नोर्स माइथोलॉजी में दो रैवन (एक प्रकार का कौवा) हगिन और मुनिन का जिक्र मिलता है। इन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह का प्रतीक बताया गया है।

    इजिप्शियन माइथोलॉजी में आत्मा के तीन रूप माने गए हैं। ये ‘का’, ‘बा’ और ‘अख’ होते हैं। इनमें ‘का’ को प्राणशक्ति बताया गया है। ‘का’ के निकलते ही व्यक्ति प्राणहीन हो जाता है।

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