Drishya Dharma
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पुरी धाम , भगवान जगन्नाथ की मूर्ति क्यों है अधूरी
भारत के पूर्वी किनारे पर, जहाँ सागर की लहरें भगवान के चरणों को छूती हैं — और ये धाम हैं पुरी धाम, जहाँ विराजमान हैं – भगवान जगन्नाथ, अर्थात् “संसार के स्वामी।”
पुरी नामक शहर, उड़ीसा राज्य में स्थित है, और इसे “जगन्नाथपुरी” या “श्रीक्षेत्र” भी कहा जाता है। यहाँ पहुँचते ही वातावरण कुछ अलग लगता है। हवा में समुद्र की महक है, लोगों की वाणी में “जय जगन्नाथ” की गूँज है,
और हर तरफ दिखते हैं रंग-बिरंगे झंडे और मंदिर की पताकाएँ। पुरी सिर्फ एक जगह नहीं, यह एक भावना है – जहाँ हर कदम पर भक्ति की लहर दौड़ती है। अब आप सोच रहे होंगे — भगवान जगन्नाथ कौन हैं?
भगवान जगन्नाथ वास्तव में भगवान विष्णु के ही स्वरूप हैं, जो श्रीकृष्ण रूप में प्रकट हुए। कहा जाता है, जब श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार पूरा किया, और द्वारका से विदा ली, तो उस समय उनका हृदय नष्ट नहीं हुआ। और वही श्रीकृष्ण का हृदय आज भी जगन्नाथ मंदिर में गुप्त रूप से सुरक्षित रखा गया है।
भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र, यानी बलदाऊ और बहन सुभद्रा — तीनों इस मंदिर में लकड़ी की मूर्ति रूप में विराजमान हैं, जिनके बड़े-बड़े नेत्र हैं, और इनके दर्शन करते समय ऐसा लगता है मानो वो अपनी बड़ी बड़ी आँखों से सदा अपने भक्तों को निहार रहे हों।
बहुत पुरानी बात है। मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न बड़े ही सात्विक और शांत स्वाभाव के थे और भगवान विष्णु के परम भक्त थे एक दिन उन्हें स्वप्न में भगवान् का दर्शन हुआ जिनका स्वरुप दिव्य था और उनका रंग काला था और उनकी आंखे बड़ी-बड़ी थी ।
भगवान ने कहा, “राजन, मैं नीलगिरी पर्वत पर विराजमान हूँ, मेरा रूप खोजो और मेरी पूजा करो।”
राजा ने बहुत खोज की, पर भगवान का रूप नहीं मिला। फिर एक दिन समुद्र किनारे लकड़ी का एक दिव्य तना मिला।
राजा ने समझा — यही भगवान का रूप है। और फिर उन्होंने एक शिल्पकार बुलाया, और उसको मूर्ति बनाने का आदेश दिया लेकिन शिल्पकार ने एक शर्त राखी और वो शर्त ये थी कि — जब तक मूर्तियाँ पूरी न बन जाएँ। तब तक दरवाज़ा बंद रहेगा, राजन ने शर्त मंज़ूर की और शिल्पकार ने मूर्ति बनाना शुरू कर दिया. शिल्पकार को थोड़ा समय बिता और इधर राजा अधीर हो गए और उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया। अंदर देखा तो मूर्तियाँ अधूरी थीं — हाथ-पैर पूरे नहीं बने थे।
राजा दुखी हुए, पर तभी आकाशवाणी हुई — “राजन, ये मूर्तियाँ अधूरी नहीं, बल्कि मेरे भक्तों के प्रति मेरा प्यार हैं।
और यहाँ यही मेरा रूप रहेगा, और इसी रूप में मैं पूजित होऊँगा।” तब से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा
उसी रूप में पूरी धाम में विराजमान हैं। पुरी का जगन्नाथ मंदिर बहुत विशाल और अद्भुत है। यह करीब 1000 साल पुराना है।
कहा जाता है कि इसे राजा अनंतवर्मन चोड़ा गंग देव ने बनवाया था। मंदिर की ऊँचाई लगभग 65 मीटर है,
और इसके ऊपर फहराता है विशाल नीला झंडा।जिसकी महिमा ये है की ये झंडा हवा की उलटी दिशा में लहराता हुआ दिखाई देता है
यह झंडा हर दिन बदला जाता है, और इसे बदलने के लिए पुजारी मंदिर के शिखर पर नंगे पैर चढ़ते हैं — बिना किसी सुरक्षा रस्सी के। कहते हैं, जब तक झंडा फहरता रहेगा, पुरी धाम में भगवान की कृपा बनी रहती है।
एक और आश्चर्यजनक बात ये है कि — आकाश में उड़ने वाले पक्षी, कभी भी मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं दिखते!
और मंदिर की छाया भी —कभी ज़मीन पर नहीं पड़ती। कहते हैं, ये भगवान जगन्नाथ की दिव्य लीला है।
पुरी की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है — रथ यात्रा। हर साल आषाढ़ महीने में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा
अपने-अपने रथों पर बैठकर मंदिर से बाहर निकलते हैं। लाखों भक्त रस्सियों से रथ खींचते हैं। कहा जाता है कि इस रस्सी को खींचने का मतलब, मोक्ष को प्राप्त कर लेना है
रथ यात्रा में भगवान के रथों के नाम भी विशेष हैं — श्रीकृष्ण का रथ है नंदीघोष, बलभद्र का तलध्वज और सुभद्रा का पद्मरथ।
भगवान जब अपने दूसरे मंदिर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, तो लोग रास्ते में झूमते हैं, नाचते हैं, भजन गाते हैं।
वो दृश्य सच में अलौकिक होता है — ऐसा लगता है मानो भगवान खुद भक्तों के बीच उतर आए हों।
पुरी का “महाप्रसाद” भी बहुत प्रसिद्ध है। भगवान को रोज़ 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और — जिसे “छप्पन भोग” कहा जाता है। इनमें चावल, दाल, सब्ज़ियाँ, मिठाइयाँ, और कई तरह के पकवान होते हैं। भोग चढ़ाने के बाद यही भोजन “महाप्रसाद” कहलाता है, और सब भक्त इसे एक साथ बैठकर खाते हैं — चाहे अमीर हो या गरीब, कोई भेद नहीं।
यहाँ का महाप्रसाद हमें सिखाता है — समानता, प्रेम और एकता।
आदि शंकराचार्य जी ने पुरी को भारत के पूर्व दिशा का धाम कहा। क्योंकि यहाँ से सूर्योदय होता है और यही से हर दिन का नया आरंभ होता है।
पुरी धाम हमें बताता है कि भक्ति का असली अर्थ सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि सभी में भगवान को देखना है।
कहा जाता है — “जो भक्त पुरी में एक दिन भी रहता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।” पुरी को “मोक्ष की भूमि” भी कहा गया है। यहाँ आत्मा को शांति और मुक्ति दोनों मिलती हैं।
आज भी पुरी में हर दिन लाखों भक्त भगवान के दर्शन करने आते हैं। सुबह सूरज की पहली किरण मंदिर के शिखर पर पड़ती है, और शंख बजते हैं। शाम को जब समुद्र किनारे दीपक जलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो खुद भगवान जगन्नाथ
अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रहे हों। पुरी की गलियाँ भक्ति से भरी हैं — हर घर से आती है आवाज़, “जय जगन्नाथ!”
पुरी में क़ोई भेदभाव नहीं, वहाँ सिर्फ प्रेम का सागर है। पुरी धाम की इस यात्रा से हमें सीख मिलती है कि भगवान हर रूप में हैं, और सच्ची पूजा है — सबमें भगवान को देखना।
पूरी की आरती पूजा और सालभर में मनाये जाने वाले विशेष उत्सव : पुरी धाम में हर दिन भगवान जगन्नाथ की सेवा 56 विधियों से होती है। दिन की शुरुआत होती है “मंगला आरती” से — सुबह सूर्योदय से पहले भगवान को जगाया जाता है। फिर “अभिषेक पूजा” होती है, जिसमें चंदन, दूध और गंगाजल से भगवान का स्नान कराया जाता है। इसके बाद “सरग बेश” — यानी भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें नये वस्त्र, फूलों के हार, और मोरपंख का मुकुट पहनाया जाता है। दोपहर को “राजभोग आरती” होती है, जिसमें भगवान को छप्पन भोग चढ़ाया जाता है। भोजन के बाद मंदिर के गर्भगृह में भक्तों के लिए भगवान के दर्शन खुलते हैं।
शाम को “संध्या आरती” और रात में “बद-शयन” होती है, जब भगवान को विश्राम के लिए ले जाया जाता है।
पुरी में सालभर कई उत्सव मनाए जाते हैं —
स्नान यात्रा, जिसमें भगवान को सार्वजनिक रूप से स्नान कराया जाता है।
नवकलेवर उत्सव, जब भगवान की मूर्तियों को नए रूप में पुनः स्थापित किया जाता है (हर 12 से 19 साल में एक बार)।
दोल पूर्णिमा और होली, जब मंदिर में रंगों का उत्सव होता है।
और दीवाली, जब पूरा पुरी शहर दीपों से जगमगाता है।
कहा जाता है कि पुरी में सूर्य की पहली किरण सीधे मंदिर के शिखर पर पड़ती है। और जब शाम को सागर किनारे आरती होती है, तब समुद्र की लहरें भी मानो भगवान के चरणों में प्रणाम करती हैं। पुरी वह स्थान है जहाँ हर दिन भगवान से मिलने की अनुभूति होती है।
अब हम आपको कुछ ज़रूरी जानकारी के बारे में बताते हूँ पूरी धाम तक पहुंचने की एक आसान जर्नी कैसे की जाये तो दोस्तों पुरी पहुँचने का सफर अपने आप में एक आध्यात्मिक अनुभव है। अगर आप देश की राजधानी दिल्ली या मुंबई से आ रहे हैं, तो भुवनेश्वर तक हवाई जहाज़ या रेल दोनों की सुविधा है। भुवनेश्वर एयरपोर्ट पुरी से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर है।
भुवनेश्वर से पुरी तक का रास्ता बेहद सुंदर है — दोनों ओर हरे-भरे पेड़, नारियल के झुरमुट, और बीच-बीच में समुद्र की झलक। आप जैसे-जैसे पुरी के पास पहुँचते हैं, हवा में समुद्र की महक बढ़ने लगती है, और मंदिर की ओर जाते हुए सड़क के दोनों तरफ “जय जगन्नाथ” के झंडे दिखाई देने लगते हैं। पुरी का रेलवे स्टेशन भी बहुत प्रसिद्ध है — यहाँ तक देश के लगभग हर बड़े शहर से सीधी ट्रेन मिल जाती है। पुरी पहुँचते ही ऐसा लगता है जैसे हवा में भी भक्ति बह रही हो —
लोगों के चेहरे पर मुस्कान, और हर ओर से आती आवाज़ — “जय जगन्नाथ!”
तो दोस्तों ये थी पूरी धाम की दर्शन यात्रा जो लोग busy scheduled के कारण पूरी धाम नहीं जा पाते और अगर वो लोग पूरी धाम मंदिर के दर्शन की अभिलाषा रखते हैं तो वो लोग दिव्य सनातन के द्वारा घर बैठे पूरी के जगन्नाथ मंदिर में अपने नाम से अनुष्ठान या संकल्प करवा सकते हैं जिससे आपको पूरी धाम दर्शन यात्रा का पूरा फल मिलेगा और वो भी घर बैठे।
जय श्री जगन्नाथ
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