Drishya Dharma
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सूर्य देव का जन्म और प्रकाश का आरंभ कैसे हुआ
सूर्य देव साक्षात् देव हैँ जोकि सभी को आँखों से स्पष्ट नजर आते हैँ. इनके जन्म को लेकर कई कीवदन्तियां हैँ कि सुर्य का जन्म कैसे हुआ? आख़िर वह कौन-सी शक्ति थी जिसने इस संसार में पहला प्रकाश फैलाया? I मगर हमारे सनातन शास्त्रों में सुर्य के जन्म और उनके प्रकाश के प्रारम्भ को लेकर स्पष्ट लिखा गया है. लेख में इसका विस्तार से वर्णन है.
सूर्य देव का जन्म – प्रकाश का आरंभ
बहुत समय पहले, जब यह सृष्टि बनी भी नहीं थी — न आकाश था, न पृथ्वी, न कोई जीव-जंतु या मनुष्य। चारों ओर केवल जल था — अनंत, शांत और गहरा। वही जल इस संसार की पहली नींव था। इसी जल से सृष्टि का आरंभ हुआ। कहते हैं कि सबसे पहले कूर्म नामक देवता प्रकट हुए। उन्होंने कहा — “मेरा जन्म तो जल से हुआ है, पर मुझसे भी पहले एक तेजस्वी शक्ति थी — वही आदित्य हैं, जिन्हें आज हम सूर्य देव कहते हैं।”
जब प्रकाश प्रकट हुआ
सूर्य देव का जन्म सृष्टि के आरंभ के साथ ही हुआ। उन्हें प्रजापति का तेज कहा गया है। प्रजापति यानी सृष्टि के रचयिता।
जब उन्होंने इस संसार को बनाने का विचार किया, तो उन्होंने अपने ही तेज का एक अंश जल में डाला। उस तेज से ऊष्मा बनी, और उस ऊष्मा से प्रकाश उत्पन्न हुआ। यही प्रकाश आदित्य कहलाया — और वही सूर्य बने। तैत्तरीय आरण्यक में लिखा है कि जब यह प्रकाश प्रकट हुआ, तो पूरा आकाश चमक उठा। यानी सूर्य देव का जन्म जल, ऊष्मा और प्रकाश —
इन तीनों के मिलन से हुआ।
आदित्य – अनंत ऊर्जा का रूप
सूर्य देव को नित्य, चैतन्य और सनातन कहा गया है। वे न उत्पन्न होते हैं, न समाप्त होते हैं। उनकी ऊर्जा से ही यह पूरी दुनिया चलती है। हर जीव के भीतर सूर्य की शक्ति प्राण के रूप में रहती है। इसीलिए उन्हें सर्वप्रकाशक कहा गया है — जो हर दिशा में प्रकाश फैलाते हैं। उपनिषदों में कहा गया है — “आदित्य ब्रह्म है।” अर्थात सूर्य केवल एक तारा नहीं, बल्कि स्वयं ब्रह्म का रूप हैं — जो जीवन को चलाते और पोषण करते हैं।
सृष्टि का केंद्र – सूर्य
सृष्टि के प्रारंभ में केवल सत् था — यानी अस्तित्व। उसी से एक ब्रह्मांडीय अंड बना। जब वह फटा, तो दो भाग हुए — एक से पृथ्वी बनी और दूसरे से आकाश। इन दोनों के बीच जो तेजस्वी केंद्र बना, वही सूर्य था — प्रकाश का आरंभ।
सूर्य के दो रूप
शास्त्रों में सूर्य देव के दो स्वरूप बताए गए हैं — एक दृश्य रूप, जो हम प्रतिदिन आकाश में देखते हैं, और दूसरा अदृश्य रूप, जो हमारे भीतर आत्मा के तेज के रूप में रहता है। सूर्य का यह तेज हमारे मन, विचार और प्राण को प्रकाशित करता है। उनकी ऊर्जा से ही जीवन, समय और प्रकृति का संतुलन बना रहता है।
सूर्य – साक्षात ब्रह्म
ऋषि-मुनियों ने सूर्य को साक्षात ब्रह्म माना है। क्योंकि जैसे सूर्य का प्रकाश सबको समान रूप से मिलता है, वैसे ही ब्रह्म भी सबमें समान रूप से मौजूद है। तैत्तरीय आरण्यक में कहा गया है — “प्रकाशामात् सूर्याय नमस्कारः।” अर्थात — “प्रकाश के मूल सूर्य को नमस्कार है।”
सूर्य केवल उजाला देने वाले नहीं, वे जीवन देने वाले भी हैं। उनके बिना न पौधे जीवित रह सकते हैं, न मनुष्य, न कोई अन्य जीव। उनसे ही समय चलता है, ऋतुएँ बनती हैं, और प्रकृति में संतुलन बना रहता है।
सूर्य – ऊर्जा और संतुलन के प्रतीक
सूर्य देव तपस्या, ऊर्जा और नियमितता के प्रतीक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि जीवन में निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। वे स्वयं निरंतर तपते हैं, पर सबको जीवन देते हैं। इसलिए वे करुणा, त्याग और शक्ति — तीनों के प्रतीक माने गए हैं।
शास्त्रों में कहा गया है — “जो सूर्य पृथ्वी और लोकों के लिए तपते हैं, वही देवताओं के पूज्य हैं।” सूर्य केवल आकाश का तारा नहीं, बल्कि वही आदित्य हैं जिन्होंने संसार में पहला प्रकाश फैलाया। वही प्रकाश आज भी हर जीवन को ऊर्जा दे रहा है।
उपसंहार
सूर्य देव का जन्म केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन, ऊर्जा और चेतना के आरंभ की कहानी है। उनकी प्रत्येक किरण हमें यह सिखाती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश हमेशा उसे मिटा देता है।
हर सुबह जब सूर्य उदय होता है, तो वह हमें नया अवसर देता है — आशा, प्रकाश और प्रेरणा का। इसलिए कहा गया है —
“ॐ आदित्याय नमः।” अर्थात — “प्रकाश और जीवन देने वाले सूर्य देव को मेरा प्रणाम।”
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