साँप और मेंढ़कों का समझौता

    ये कहानी एक ऐसे तालाब की है, जहाँ भोले-भाले मेंढ़क रहते थे और एक चालाक बूढ़ा साँप अपनी भूख मिटाने के लिए उनके साथ एक चाल चलता है। अब सवाल उठता है की क्या वो अपनी चाल में कामयाब हो पाया या नहीं जानने के लिए कहानी को आगे पढ़ते हैं.

    बहुत समय पहले, एक हरे-भरे जंगल के बीच एक बड़ा तालाब था। तालाब की जलधारा निर्मल थी। कमल के फूल खिले रहते, सरकंडों की झाड़ियाँ हवा में सरसरातीं और सबसे अधिक, वहाँ मेंढ़कों की टर्र-टर्र गूँजती रहती। मेंढ़कों का एक बड़ा झुंड वहाँ दिन-रात मौज करता। वे कूदते-फाँदते, मस्ती करते और कभी-कभी अपने राजा के आदेश पर सभा भी लगाते।

    तालाब के पास ही, एक पुरानी बबूल की झाड़ी के नीचे एक बूढ़ा साँप रहता था। वह कभी बहुत तेज़ और ख़तरनाक हुआ करता था, लेकिन उम्र ढलने के साथ उसके दाँतों की धार कम हो गई थी, और अब उसके लिए शिकार पकड़ना कठिन हो गया था।

    एक दिन वह भूख से तड़प रहा था। उसने सोचा— “अगर मैं ऐसे ही पड़ा रहा, तो भूखा मर जाऊँगा। मुझे कोई ऐसी तरकीब सोचना होगी, जिससे खाना भी मिलता रहे और किसी को शक भी न हो।” कुछ देर सोचने के बाद उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने तय किया— “मैं डराने के बजाय मीठी बातों से इन्हें फँसाऊँगा।”

    अगली सुबह जब सूरज की किरणें पानी में सुनहरी लहरें बना रही थीं, साँप धीरे-धीरे सरकता हुआ तालाब के किनारे पहुँचा। मेंढ़कों ने उसे देखा तो सब डर के मारे छिप गए। तालाब में हलचल मच गई। साँप ने बहुत धीमे और थके हुए स्वर में कहा—

    “डरो मत, मित्रो… मैं अब बूढ़ा हो चुका हूँ। मुझसे शिकार करना तो दूर, सीधा चलना भी मुश्किल हो गया है। मैंने सोचा, क्यों न अपनी शेष आयु तुम्हारी सेवा में बिता दूँ। यदि चाहो तो मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर घूमाया करूँगा।”

    शुरू में मेंढ़क काँपते रहे। कुछ देर बाद एक छोटा मेंढ़क बोला— “देखो, यह साँप हिल भी नहीं पा रहा। शायद सचमुच बुढ़ा गया है।”

    धीरे-धीरे कुछ साहसी बच्चे उसकी पीठ पर चढ़ गए। वे हँसते-खेलते रहे और साँप चुपचाप लेटा रहा। धीरे-धीरे सबका डर दूर हो गया। अब रोज़ का दृश्य यह था— मेंढ़क बच्चे साँप की पीठ पर सवारी करते, और साँप एक शांत, थका हुआ सेवक बनकर बैठा रहता।

    लेकिन असलियत अलग थी। जब भी साँप को भूख लगती, वह किसी कोने से धीरे से एक-आध मेंढ़क निगल लेता। शुरू में मेंढ़कों को शक हुआ, लेकिन राजा ने उन्हें समझाया— “भाइयो, इतने बड़े झुंड में अगर एक-दो गायब हो जाएँ, तो चिंता की बात नहीं। सोचो, हमें एक सेवक मिला है। हमें डर से मुक्ति मिली है। थोड़ी-बहुत हानि तो सहनी ही पड़ती है।” राजा की बात सुनकर सब चुप हो गए।

    दिन बीतते गए। साँप ने अपनी चालाकी से रोज़-रोज़ किसी न किसी को निगल लिया। तालाब में मेंढ़कों की संख्या घटती चली गई। पहले बच्चे गायब हुए, फिर जवान, और अंत में केवल कुछ बूढ़े और राजा ही बचे। राजा अब भी अपने घमंड में कहता रहा— “देखो, मैंने समझदारी से फैसला किया। हमने दुश्मन को मित्र बना लिया है।” लेकिन सच तो यह था कि वही ‘मित्र’ उनके विनाश का कारण बन रहा था।

    एक रात जब चाँदनी तालाब पर बिखरी थी, साँप ने सोचा—“आज क्यों न आख़िरी भोज कर लूँ।” उसने धीरे से सरककर राजा को ही निगल लिया। अब तालाब सुनसान था। न टर्र-टर्र की आवाज़, न बच्चों की कूद-फाँद।

    केवल सन्नाटा। साँप की चालाकी सफल हुई, लेकिन मेंढ़कों की नासमझी ने पूरे वंश को मिटा दिया।

    इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि स्वार्थी और चालाक दुश्मन कभी सच्चा मित्र नहीं हो सकता। अगर कोई नेता केवल अपनी सुविधा या आराम के लिए दुश्मन से समझौता करता है, तो उसकी प्रजा ही नहीं, बल्कि अंततः वह स्वयं भी विनाश को प्राप्त होता है। राजनीति और जीवन में हर मीठी बात पर भरोसा करना मूर्खता है। असली सुरक्षा और सफलता हमेशा बुद्धि, विवेक और सतर्कता में ही छिपी होती है।

    धन्यवाद।

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