Drishya Dharma
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हाथी, लोमड़ी और छोटा तालाब
इस कथा से हम जानेंगे कि सिर्फ ताक़त या अहंकार से शासन नहीं होता, बल्कि सच्चे शासक वही होते हैं जो सबके हित का ध्यान रखते हैं।
कहानी—‘हाथी, लोमड़ी और छोटा तालाब’।” कुछ यूँ है.. बहुत समय पहले, एक घना और हरा-भरा जंगल था। उस जंगल का सबसे बड़ा और शक्तिशाली जीव था—गजेंद्र नाम का हाथी। गजेंद्र इतना विशाल था कि जब वह चलता, तो ज़मीन हिलने लगती। जहाँ-जहाँ से वह निकलता, पेड़ झुक जाते, छोटी नदियाँ तक बदल जातीं। बाक़ी सभी जानवर उसे देखकर डर से किनारे हट जाते। गजेंद्र शक्तिशाली ज़रूर था, लेकिन उसे एक परेशानी थी। उसे पानी की बहुत ज़रूरत होती थी।
गर्मी हो या सर्दी, उसे रोज़ नदी तक जाकर खूब पानी पीना पड़ता। नदी दूर थी, और वहाँ तक पहुँचने में उसे कई घंटे लगते। हर बार इतना लंबा रास्ता तय करना उसके लिए थकाने वाला था।
गजेंद्र मन ही मन सोचता—
“काश, मेरे पास पास में ही कोई पानी का स्रोत होता, तो मुझे रोज़ इतना लंबा चलना न पड़ता।”
जंगल के बीच में एक छोटा तालाब था।
यह गहरा नहीं था, लेकिन वहाँ सालभर साफ पानी रहता था। उस तालाब में मेंढक, मछलियाँ और कछुए रहते थे। उनके लिए यही तालाब उनका घर, उनका जीवन था। एक दिन उन्होंने देखा कि गजेंद्र इधर-उधर घूमते हुए तालाब की तरफ देख रहा है। वे डर गए और आपस में कहने लगे—
“अगर यह हाथी यहाँ रोज़ आने लगा, तो हमारा घर उजड़ जाएगा। उसके बड़े पैरों से हमारे घोंसले और घर टूट जाएँगे। हमें कोई उपाय करना होगा।”
उस तालाब के पास ही एक लोमड़ी रहती थी। वह बहुत चालाक और धूर्त थी। छोटे जीव उसकी बुद्धि की काफ़ी इज़्ज़त करते थे। वे सब मिलकर लोमड़ी के पास गए और बोले—
“माता लोमड़ी, हमारी मदद करो। अगर हाथी ने इस तालाब को अपना घर बना लिया, तो हम सब नष्ट हो जाएँगे।”
लोमड़ी ने आँखें मिचमिचाते हुए मुस्कुराकर कहा—“चिंता मत करो। मैं उस हाथी को अपने दिमाग से यहाँ से भगा दूँगी। बस थोड़ी देर धैर्य रखो।” लोमड़ी धीरे-धीरे हाथी के पास आने लगी। वह उसकी बातें सुनती, उसकी ताक़त की तारीफ़ करती। “वाह गजेंद्र महाराज! आपके जैसे बलवान का तो कोई जवाब ही नहीं। आप तो पूरे जंगल के राजा कहलाने लायक हैं।” हाथी को यह सुनकर बहुत अच्छा लगता। वह सोचता—“लोमड़ी मेरी सच्ची मित्र है। यह मेरा भला चाहती है।” धीरे-धीरे हाथी को लोमड़ी पर पूरा भरोसा हो गया।
एक दिन लोमड़ी बोली— “मित्र गजेंद्र! आप रोज़ नदी तक क्यों जाते हैं? क्या आप जानते हैं कि हमारे जंगल के बीच एक राज-तालाब है? यह तालाब देवताओं का उपहार है। कहा जाता है कि जो इस तालाब से जल पीता है, वही जंगल का सच्चा राजा बनता है। अगर आप वहाँ से पानी पिएँगे, तो आपका राज अटल हो जाएगा।”
हाथी की आँखें चमक उठीं।
वह मन ही मन सोचने लगा—“अगर यह सच है, तो मुझे इस तालाब को अपना बनाना ही चाहिए।
मैं तो पहले से ही सबसे शक्तिशाली हूँ, और यह तालाब मुझे सच्चा राजा घोषित कर देगा।” अगले ही दिन हाथी तालाब की ओर बढ़ा। उसके विशाल कदमों से ज़मीन काँप रही थी। तालाब के पास रहने वाले छोटे जीव भयभीत हो गए।
“आ गया! आ गया हाथी!”
मेंढक तालाब में कूद पड़े, मछलियाँ भागने लगीं, कछुए अपने खोल में छिप गए। हाथी ने गर्व से सूँड उठाई और तालाब में प्रवेश कर गया। उसके भारी पैरों से मिट्टी उड़ने लगी, पानी गंदा हो गया।
कई छोटे जीव कुचल गए, कई अपने घर छोड़कर भाग खड़े हुए।
हाथी हँसते हुए बोला—
“अब यह तालाब मेरा है। मैं यहाँ रोज़ पानी पिया करूँगा। अब मैं जंगल का असली राजा कहलाऊँगा।” लेकिन तभी अचानक हाथी का पैर गहरे कीचड़ में फँस गया। वह जितना बाहर निकलने की कोशिश करता, उतना ही धँसता चला गया।
हाथी घबराकर चिल्लाने लगा—“बचाओ! कोई तो मुझे बचाओ!” लोमड़ी पास खड़ी सब देख रही थी।
वह मुस्कुराकर बोली— “मित्र गजेंद्र! जिसे तुम अपनी जीत समझ रहे थे, वही तुम्हारा जाल बन गया।
यह तालाब उन छोटे जीवों का घर है। तुमने उनके घर को नष्ट किया, और अब तुम खुद इस कीचड़ में फँस गए हो। याद रखो—केवल ताक़त से राज नहीं चलता। अगर तुम सबको साथ लेकर चलते, तो आज यह हाल न होता।” काफी मशक्कत के बाद हाथी किसी तरह बाहर तो निकल आया, लेकिन वह बहुत थक चुका था और शर्मिंदा भी था।
उसने तालाब की ओर देखकर कहा—“मैंने गलती की। मैंने सोचा था कि ताक़त से सब कुछ पा सकता हूँ, लेकिन आज समझा कि राज वही टिकता है जिसमें सबका हित हो। अब मैं कभी अहंकार में आकर दूसरों का घर नहीं उजाड़ूँगा।” छोटे जीव चैन की साँस लेने लगे और तालाब फिर से शांत हो गया।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि राजनीति और जीवन में केवल ताक़त काफ़ी नहीं होती। अगर कोई शासक या नेता झूठी प्रशंसा में आकर लालच करता है और दूसरों का नुकसान करता है, तो अंततः वह स्वयं ही उसमें फँस जाता है। असली शासक वही होता है जो छोटे-बड़े सभी का हित समझे, सबको साथ लेकर चले और सबके घर-परिवार की रक्षा करे। यही नीति सच्चे राज और स्थायी नेतृत्व की पहचान है।
धन्यवाद।
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