Drishya Dharma
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लोभी मंत्री और चतुर गड़रिया
किसी समय की बात है। कौशलनगर नामक राज्य में वीरेंद्र नाम का राजा राज करता था। राजा न्यायप्रिय था, लेकिन बहुत सरल स्वभाव का। उसकी एक कमी थी—वह दूसरों की बात जल्दी मान लेता था।
दरबार में उसका मंत्री था—क्रूरक, जो बाहर से बड़ा वफ़ादार लगता था लेकिन भीतर से स्वार्थी और लालची था। राजा अक्सर अपने प्रजाजनों की हालत जानने भेष बदलकर घूमने निकलता था । एक दिन वो घूमता घूमता नगर से दूर निकल गया और जंगल के रास्ते में पहुँच गया। जंगल के किनारे एक गाँव में माधव नाम का गड़रिया अपनी भेड़ों के साथ रहता था। वह बहुत साधारण इंसान था, लेकिन अक्ल और अनुभव में कोई उससे आगे न था।
राजा ने भेष बदलकर माधव से बातचीत शुरू की। राजा ने पूछा—“भाई, तुम्हारे गाँव में लोग कैसे हैं? क्या राजा से संतुष्ट हैं?”
माधव बोला— “महाराज, लोग तो संतुष्ट हैं, पर सुना है दरबार के मंत्री बहुत लालच करते हैं। उनकी नज़र किसानों और व्यापारियों की कमाई पर रहती है। अगर राजा ध्यान न दे तो एक दिन मंत्री पूरा राज्य बेच देगा।” राजा यह सुनकर चौंका। उसने मन ही मन सोचा—“मुझे इसकी परीक्षा लेनी होगी “.
अगले दिन दरबार में राजा ने मंत्री क्रूरक से कहा— “सुनो मंत्री, मैंने सुना है कि जंगल में एक साधारण गड़रिया बड़ा समझदार है। क्या सच में एक गरीब चरवाहा राजनीति समझ सकता है?”
मंत्री ने व्यंग्य से कहा—“महाराज, वह तो मूर्ख गाँव वाला है। राजनीति और नीति-कथा सिर्फ विद्वानों का काम है।”
राजा मुस्कुराया और बोला—“तो चलो, उसकी परीक्षा लेते हैं।” कुछ दिनों बाद गड़रिये माधव को दरबार में बुलाया गया। राजा ने पूछा—“माधव! अगर तुम्हें मंत्री बना दिया जाए तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?”
माधव ने शांत भाव से उत्तर दिया—“महाराज, मैं सबसे पहले राज्य का खजाना सुरक्षित करूँगा। क्योंकि जहाँ धन सुरक्षित नहीं, वहाँ मंत्री या राजा दोनों का सम्मान नष्ट हो जाता है।”
राजा प्रभावित हुआ। लेकिन मंत्री क्रूरक को यह अच्छा नहीं लगा। उसने सोचा—“अगर यह गड़रिया ज्यादा बोल गया, तो मेरी पोल खुल जाएगी।”
क्रूरक ने राजा से कहा—“महाराज, यह गड़रिया झूठ बोलता है। असली रंग तो तब पता चलेगा जब इसे धन और शक्ति का प्रलोभन मिलेगा। मुझे अनुमति दें कि मैं इसकी परीक्षा लूँ।”
राजा ने अनुमति दी।
मंत्री ने माधव को गुप्त रूप से बुलाया और सोने की एक थैली उसके आगे रख दी। बोला—
“अगर तुम राजा के सामने कह दो कि मंत्री ही राज्य का सबसे सच्चा सेवक है, तो यह सोना तुम्हारा होगा।”
माधव मुस्कुराया और बोला—
“ठीक है।”
अगले दिन सभा में राजा ने गड़रिये से फिर पूछा—“बताओ माधव, तुम्हें सबसे योग्य सेवक कौन लगता है?”
माधव ने वही सोने की थैली दरबार के बीच में रखी और बोला—“महाराज, कल मंत्री जी ने मुझे यह सोना दिया, ताकि मैं उनकी प्रशंसा करूँ। पर सच्चा मंत्री वही है जो राजा का नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का सेवक न बने।” पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
राजा ने क्रूरक से कड़े शब्दों में कहा—“तुम पर मुझे सबसे अधिक विश्वास था, लेकिन तुम ही राज्य को लूटने वाले निकले। अब तुम्हें इस पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं।” राजा ने मंत्री को पद से हटा दिया और ईमानदार सलाहकारों की नियुक्ति की। माधव को उसने सम्मान देकर गाँव लौटने की अनुमति दी.
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि राजनीति में सबसे बड़ा गुण ईमानदारी और पारदर्शिता है। जो शासक केवल चमचों की बात मानता है, वह अंततः धोखा खा जाता है। और याद रखो, बुद्धि और सत्य अक्सर साधारण लोगों में भी छिपा होता है, जिसे समझने और पहचानने की दृष्टि राजा के पास होनी चाहिए।
धन्यवाद।
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