महात्मा हितहरिवंश जी महाराज।

    हम आपको लेकर चल रहे हैं उस दिव्य रस की ओर… जहाँ भक्ति सिर्फ पूजा नहीं रहती, बल्कि प्रेम बन जाती है। जहाँ भजन सिर्फ गाना नहीं, बल्कि हृदय की धड़कन होता है। और इस अनोखी भक्ति के रसिक सम्राट हैं—महात्मा हितहरिवंश जी महाराज।

    उनकी जीवनकथा… एक साधक, एक कवि, और एक अनोखे रसोपासक की कथा के रूप में है. यह सोलहवीं शताब्दी का समय था। देश की राजनीति मानो आँधी-तूफ़ान से गुजर रही थी। दिल्ली की गद्दी पर कभी हुमायूँ का राज चलता, तो कभी शेरशाह सूरी सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लेता। लेकिन इन सब हलचलों के बीच, संतों और कवियों की वाणी ने लोगों के दिलों में भक्ति का दिया जलाए रखा। कबीर अपने दोहों से सच्चे ईश्वर की ओर मार्ग दिखा रहे थे। गुरु नानक प्रेम, भाईचारे और समानता का संदेश फैला रहे थे। सूरदास अपनी मधुर रचनाओं से कृष्ण-भक्ति की गंगा बहा रहे थे। और चैतन्य महाप्रभु अपने कीर्तन और नृत्य से जन-जन को भक्ति रस में डुबो रहे थे।

    इन्हीं दिनों मथुरा के पास वाद ग्राम में एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। तिथि थी—विक्रम संवत 1556, वैशाख शुक्ला एकादशी। उस बालक के पिता का नाम था व्यास मिश्र—वो बड़े धर्मनिष्ठ ब्राह्मण। और माता थीं तारादेवी—स्वाभाव से सती और साध्वी। इस बालक का नाम रखा गया—हितहरिवंश।

    शिशु का स्वभाव अद्भुत था। कहते हैं, जैसे ही वे “राधा” नाम सुनते, हँस पड़ते, किलकारियाँ भरते।

    इतना ही नहीं—छ: महीने की अवस्था में ही उनके मुख से ‘राधा सुधा निधि’ के श्लोक फूट पड़े।

    लोग विस्मित रह गए। उनका परिवार जान गया कि यह बालक साधारण नहीं है—यह तो राधा-कृष्ण का परम रसिक भक्त है।

    एक दिन बालक हितहरिवंश अपने साथियों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते वे राधा और कृष्ण की मूर्तियाँ बना लेते—कभी राधा को कृष्ण के स्थान पर बैठा देते, कभी कृष्ण को राधा की जगह।

    उनके पिता जब ठाकुरजी का श्रृंगार कर ध्यान कर रहे थे, तो अचानक उन्होंने देखा—राधा के स्थान पर कृष्ण और कृष्ण के स्थान पर राधा विराजमान हैं! वे चौंक गए। लेकिन बाहर जाकर देखा तो—हितहरिवंश खेल में यही लीला कर रहे थे। पिता समझ गए—यह बालक लीला करने आया है।

    एक और अद्भुत घटना घटी।

    पाँच वर्ष की आयु में हितहरिवंश खेलते-खेलते एक सूखे कुएँ में गिर पड़े। पिता दौड़े—लेकिन तभी कुएँ से दिव्य प्रकाश फूटने लगा। और सबने देखा—बालक हितहरिवंश एक सुंदर श्यामसुंदर विग्रह को अपनी गोद में लिए बाहर आ रहे हैं। उस विग्रह का नाम उन्होंने रखा—नवरंगी लाल। यहीं से उनकी पूजा और भक्ति का मार्ग और गहरा हो गया। आठ वर्ष की आयु में उनका उपनयन संस्कार हुआ। सोलह वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हुआ—रुक्मिणी देवी से। लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही माता-पिता का देहांत हो गया। इस दुख ने हितहरिवंश को भीतर तक हिला दिया। उन्होंने तय किया—अब जीवन राधा-कृष्ण की भक्ति में ही अर्पित होगा। और वे चले—वृंदावन की ओर।

    वृंदावन… जहाँ हर पेड़-पौधा, हर कण, हर हवा राधा-कृष्ण की लीलाओं से भरी है। यहीं उन्होंने सेवाकुंज को अपना निवास बनाया। नवरंगी लाल की मूर्ति को घरवालों को सौंपकर, खुद वृंदावन में राधा-कृष्ण की अनंत सेवा में लीन हो गए। यहीं से उन्होंने काव्य-रचना आरंभ की। उनकी वाणी मधुर थी, रस से भरी थी। उनका मानना था—कृष्ण राधा से कभी अलग नहीं होते। वियोग का स्थान ही नहीं। केवल मिलन, केवल मधुरता, केवल प्रेम का रस। हितहरिवंश जी ने राधा-वल्लभ संप्रदाय की स्थापना की। इस संप्रदाय में राधा को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया। उनका कथन था—

    “श्रीराधा की प्रसन्नता से ही कृष्ण-भक्ति का आनंद मिलता है।”

    उनकी वाणी में राधा के प्रति असीम अनुराग झलकता है। वह कहा करते थे—

    "रसना कटी जू अन रटो, निरखि अन फुटो नैन।

    सुनौ अन स्वर रसबस, विन राधा जस बैन।"

    यानी—मेरी जिह्वा सिर्फ राधा का नाम जपे, मेरी आँखें सिर्फ राधा का रूप देखें, मेरे कान सिर्फ राधा की लीलाओं का रस पिएं। समय बीतता गया। हितहरिवंश जी वृंदावन में हर समय राधा-कृष्ण की लीलाओं का चिंतन करते। संत सूरदास, हरिदास स्वामी, व्यासदास—इन सबके साथ उनका सत्संग होता। सभी मानते थे कि हितहरिवंश रसोपासना के आचार्य हैं। उनकी सबसे बड़ी देन थी—राधा-केंद्रित भक्ति। उनका कहना था—भगवान की सर्वोत्तम सिद्धि, उनकी पूर्णता—राधा हैं। और फिर आया—विक्रम संवत 1609 की शरद पूर्णिमा। वृंदावन में चाँदनी रात थी। यमुना के तट पर रास लीला का दिव्य दृश्य बिखरा था। गोपियाँ गा रही थीं, बांसुरी बज रही थी।

    और हितहरिवंश जी उस दृश्य में पूरी तरह डूब गए।

    वहीँ, उसी रात… उनकी देहलीला समाप्त हुई। कहा जाता है—उन्होंने प्रिया-प्रियतम के उस पूर्णतम रास-विहार का दर्शन किया… और उसी लीला में लीन हो गए। दोस्तों, महात्मा हितहरिवंश जी की कथा हमें यह सिखाती है कि— भक्ति का असली अर्थ है प्रेम। जहाँ कोई भेद नहीं, कोई दूरी नहीं, कोई वियोग नहीं। सिर्फ मिलन, सिर्फ रस, सिर्फ प्रेम।

    उनकी वाणी आज भी हमें यह याद दिलाती है कि यदि हृदय में राधा का नाम बस जाए, तो वही सबसे बड़ा सुख है.

    धन्यवाद |

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