Drishya Dharma
Read this spiritual story.
संत धरमदास जी
“राम रसाइन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल।
कबीर पोवन दुलम है, भागे सोस फलाल॥”
इस दोहे से ज्ञात होता है कि राम-रस पीना कितना कठिन है। अहंकार का संपूर्ण समर्पण किए बिना, यह दिव्य रस कोई नहीं पी सकता। और इस रस को पीने वाले महापुरुषों में से एक थे — संत धरमदास जी।
धरमदास जी, संत कबीर दास के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उनका जीवन केवल भक्ति, ज्ञान और सत्य के मार्ग पर चलने का उदाहरण नहीं था, बल्कि वह उस दौर के समाज और राजनीति के बीच आध्यात्मिक ज्योति बनकर चमके।
धरमदास जी का जन्म लगभग संवत 1475 में बाँधोगढ़ (वर्तमान मध्यप्रदेश के आसपास माना जाता है) में हुआ। वे वनिया (वैश्य) समाज से थे। घर संपन्न था, व्यापार फल-फूल रहा था। लेकिन बचपन से ही उनका झुकाव साधु-संतों की सेवा, भजन-कीर्तन और भगवान के चिंतन की ओर था।
वे घंटों तक शालिग्राम की पूजा करते, और श्रीमद्भगवद्गीता में गहरी आस्था रखते थे। उनके मन में यह प्यास थी कि परमात्मा का सच्चा स्वरूप क्या है?
“घरमदास बधो के वानी, प्रेम प्रीति भक्ति में जानी।
सालिगराम की सेवा करई, दया-घरम वहुते चित घरई॥”
यह पंक्तियाँ उनके पूर्व जीवन के भगवत-भक्त स्वभाव को प्रकट करती हैं। एक बार वे मथुरा तीर्थ यात्रा पर गए। वहीं उनकी भेंट संत कबीर साहब से हुई। कल्पना कीजिए — मथुरा का पवित्र धाम, जहाँ गली-गली में कृष्ण-भक्ति का स्वर गूँज रहा है। और वहीं एक साधारण-सा बुनकर संत, जिनकी आँखों में करुणा और वाणी में सत्य की तलवार थी — वो थे संत कबीर। धरमदास जी ने कबीर की वाणी सुनी और उनके भीतर जैसे सोते हुए मन को जगाने वाली बिजली चमक गई हो।वो ऐसे उत्साहित हो उठे।
कबीर ने कहा —
“जब तक मन में सकाम भाव है, तब तक नर-नारी नरक समान है।
निष्काम भाव का उदय होते ही, मनुष्य राम का हो जाता है।”
धरमदास जी के हृदय में कबीर के ये शब्द बहुत गहराई से उतर गए थे। वो कबीर साहब के चरणों में गिर पड़े और बोले —
“गुरुजी, मुझे इस भवसागर से पार उतार दीजिए। मैं भटक चुका हूँ, अब आपके सहारे की आवश्यकता है।”
धरमदास जी की विनम्र प्रार्थना सुनकर कबीर साहब ने उन्हें शरण दी। धरमदास जी ने एक पद में अपनी व्याकुलता यूँ व्यक्त की — “गुर पैया छागो नाम लखा दीजो रे।
जनम-जनम का सोया मनुवा, सवदन सार जगा दीजो रे॥”
यही वह क्षण था जब उनका जीवन बदल गया। अब वे केवल एक व्यापारी नहीं रहे, वे ज्ञान और भक्ति के व्यापारी बन गए।
काशी में कबीर साहब के सत्संग से धरमदास जी को आत्मज्ञान की गहरी अनुभूति हुई।
उन्होंने अनुभव किया कि , धन, परिवार, संपत्ति सब नश्वर है। और केवल एक राम-नाम ही शाश्वत है। और ये भी सत्य है कि गुरु की कृपा से ही निर्गुण परमात्मा का अनुभव संभव है। उन्होंने सब त्याग कर कबीर को ही अपना प्रमुख गुरु मान लिया।
धरमदास जी का ये भाव बड़ा ही अद्भुत था — उन्होंने संत कबीर से भावपूर्ण होकर कहा “साहेब, मेरी ओर देखते रहिए। मुझसे भूल हो तो सुधार दीजिए। मैं आपका हूँ, और आपका ही रहूँगा।”
कबीर साहब ने एक बार कहा था —
“लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल॥”
धरमदास जी ने इस “लाली” का अनुभव अपने जीवन में किया। उन्होंने एक पद में कहा —
“साहेब, तेरी देखाँ सेजरिया हो।
लाल महल के लाल कगूरा, लालिनि लागि किवरिया हो॥”
यह “लालिमा” परमात्मा के प्रेम और भक्ति की आभा थी, जिसमें उनका पूरा जीवन रंग गया।
अब धरमदास जी दिन-रात राम-नाम में डूबे रहते। उनकी साधना केवल व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं थी, बल्कि समाज को यह संदेश देना था कि — जाति-पाँति से ऊपर उठो।बाहरी आडंबर से मुक्त रहो। और केवल प्रेम और भक्ति से ईश्वर प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा —
“फहो केते दितत जियवौ हो, का करत गुमान।
कच्चे वोसन का पिजरा हो, जामें पवन समान॥”
यानी यह शरीर मिट्टी का पिंजरा है, इसमें बस कुछ समय के लिए प्राण रहते हैं। तो इसमें घमंड कैसा?
धरमदास जी ने कबीर साहब की वाणी को “बीजक” के रूप में संकलित किया। यही कारण है कि कबीर की अमर वाणी आज भी उपलब्ध है।
कबीर साहब के देहावसान के बाद धरमदास जी को उनका उत्तराधिकारी माना गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ शाखा की नींव रखी और संतमत को आगे बढ़ाया।
धरमदास जी कहते थे — “सतगुरु दिहले जगाड, पायों सुध-सागर हो।” उनकी वाणी भावुक और सरल थी। उन्होंने जनभाषा में ही अपने अनुभव प्रकट किए, ताकि हर कोई समझ सके।
उनका संदेश स्पष्ट था — गुरु की शरण ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। जिसमे राम-नाम ही भवसागर से पार लगाने वाली नौका है। और सांसारिक मोह-माया क्षणभंगुर है।
धरमदास जी ने संवत 1600 के आसपास अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। लेकिन उनके पद और उनकी विरासत आज भी हमें सीखाते हैं कि — भक्ति का सच्चा मार्ग अहंकार, लोभ और मोह से दूर होकर ही संभव है।
उनका विश्वास था कि — “गुरु बिना ज्ञान नहीं, और गुरु की कृपा से ही आत्मा अपने प्रियतम से मिलती है।”
संत धरमदास जी का जीवन केवल संत-कथा नहीं है, बल्कि एक दीपक है जो हमें अंधकार में रास्ता दिखाता है। जब भी हम जीवन की भागदौड़ में उलझते हैं, सांसारिक मोह में फँसते हैं, तब धरमदास जी की वाणी हमें पुकारती है —
“राम-नाम ही सहारा है, गुरु ही नाविक हैं।” और एकमात्रयही उनका सबसे बड़ा संदेश है।
धन्यवाद |
You can read spiritual stories directly on the story reader page. Each story provides complete text content that you can read online without any app download.
Yes, Sanatan provides spiritual stories in multiple languages. You can switch the interface language using the language toggle to read stories in your preferred language.
Some stories have video versions available. When a video is available, you will see a Watch Story button alongside the Read Story button on the story card.