Drishya Dharma
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दक्षिण के कबीर कहे जाने वाले संत वेमना
दक्षिण भारत के एक ऐसे महान संत की यह कहानी है. जिन्हें “दक्षिण का कबीर” कहा जाता था और उनका नाम है संत वेमना।
यह कहानी एक ऐसे महान पुरुष की है जिसने जीवन की हर भूल, हर भोग, हर भटकाव को अनुभव करके अंत में सच्चे आत्मज्ञान और शिवभक्ति का मार्ग पाया।
करीब पाँच सौ साल पहले, दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में, एक गाँव– मूगचिन्तल में एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर संत वेमना कहलाए। वेमना का जन्म रेड्डी समाज के एक धार्मिक और सम्पन्न परिवार में हुआ। उनके पिता शिवभक्त थे और साधु-संतों की सेवा करना उन्हें बहुत प्रिय था। उनके घर का माहौल धार्मिक होने के साथ साथ आराम और वैभव से भी भरपूर था। इसलिए छोटे वेमन को कभी किसी भी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई थी। बचपन से ही वो तेजस्वी और प्रतिभाशाली थे।उनकी पढ़ाई-लिखाई भी ठीक-ठाक हुई, परंतु घर के वैभव और समय की बुरी आदतों का असर उन पर खूब पड़ा।
युवावस्था में आते-आते वेमना का जीवन पूरी तरह ऐश-ओ-आराम में डूब चूका था। वो दोस्तों के साथ समय बिताते, और खूब पैसे भी खर्च करते और धीरे-धीरे वेश्याओं और नशे की ओर खींचते चले गए।
समाज के कई धनी और प्रभावशाली लोग भी ऐसी ही जिंदगी जी रहे थे, इसलिए किसी ने उन्हें रोकने-टोकने की कोशिश भी नहीं की।
इतना सब होने के बाद भी, भोग और विषय की दुनिया ने उन्हें सुख नहीं दिया, बल्कि उन्हें और अधिक बेचैनी दी।और धीरे धीरे ये बेचैनी इतनी बढ़ गई कि वो खुद से घृणा करने लगे।
वेमना अपनी भाभी नरसम्मा का बहुत सम्मान करते थे। एक दिन जब वो बेहद उदास थे, तो नरसम्मा ने पूछा –
“भैया, आप क्यों उदास हो? लोग आपका मज़ाक उड़ाते हैं। कहते हैं कि आप सिर्फ़ धन लुटाने वाले एक आवारा नासमझ बालक हैं। अगर आप बुरा न माने तो मेरे पास आपके लिए एक सुझाव है क्यों न आप शादी कर लें? शायद उसके बाद आपकी ज़िंदगी संभल जाए।”
भाभी की ये बात वेमना के दिल को छू गई। उन्होंने विवाह कर लिया और दाम्पत्य जीवन शुरू हुआ। पत्नी के साथ कुछ समय उन्होंने प्रेम, मस्ती और आनंद से बिताया। परंतु उनका मन यहाँ भी टिक नहीं पाया।
पत्नी का स्वभाव कठोर था और वेमना का मन बार-बार कहता – “मैं इस संसार में आया किसलिए? क्या सिर्फ़ भोग और परिवार में उलझने के लिए?” धीरे-धीरे वेमना की अंतरात्मा जाग उठी। उन्होंने महसूस किया कि वो जिस राह पर चल रहे हैं, वह उन्हें और गहरे अंधकार में ले जाएगी। उन्होंने शिव से प्रार्थना की – “हे प्रभु! मुझे इस पाप और व्यभिचार से निकालो। मुझे आपके भजन में, आपके नाम में डूबने दो।”
उनके मन में वैराग्य अंकुरित होने लगा। बचपन से ही उनके भीतर संन्यास का बीज छुपा हुआ था, जो अब पल्लवित हो गया।
अंततः एक दिन उन्होंने संसार त्यागने का निर्णय ले लिया। वेमना निकल पड़े एक सच्चे गुरु की तलाश में। उन्हें मिले लम्बिका शिवयोगी। यहीं से उनकी जीवन यात्रा ने नया मोड़ लिया।
लम्बिका योगी ने उन्हें दीक्षा दी। पहले तो वेमना को सोने बनाने (स्वर्णयोग) की विद्या में आकर्षण हुआ, पर जल्दी ही उन्होंने उसे त्याग दिया।
उन्होंने योग और साधना को अपनाया। दिगम्बर होकर, वस्त्रहीन घूमते हुए वे लोगों को समझाने लगे – “जन्म के समय कपड़ा नहीं, मृत्यु के समय भी कपड़ा नहीं। तो फिर बीच का दिखावा क्यों?”
धीरे-धीरे वे आत्मज्ञानी और शिवयोगी बन गए। उन्होंने अपने भीतर वह “नाद” सुना, वह “ज्योति” देखी, जिसने उन्हें शिव का साक्षात्कार कराया।
संत वेमना अपने अनुयायियों को जीवन के सात सरल लेकिन गहन नियम बताते हैं। वे कहते हैं – चोरी मत करो और किसी का दिल कभी मत दुखाओ, क्योंकि यह आत्मा को कलुषित करता है। दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या मत करो, बल्कि प्रेरणा लो। हर जीव मात्र पर दया रखो, क्योंकि करुणा ही सच्चा धर्म है। सदा ईश्वर का चिंतन करो, यही मन की शांति और शक्ति का आधार है। क्रोध को त्याग दो, क्योंकि क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देता है। और अंत में, जितना भी मिले उसी में संतोष रखना सीखो, क्योंकि संतोष से ही जीवन में आनंद और स्थिरता आती है।
उन्होंने समाज को समझाया कि परमात्मा हमारे भीतर ही है। उन्हें बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं। वो कहा करते थे – “हाथ में मक्खन लेकर उसे बाहर ढूँढने वाला मूर्ख है। वैसे ही इंसान अपने हृदय में भगवान रखकर भी उन्हें बाहर ढूँढता है।”
वेमना का जीवन सिर्फ़ साधना तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने समय के समाज में फैली बुराइयों पर तीखे प्रहार किए।
मंदिरों में देवदासियों और नृत्यगान के बहाने व्यभिचार फैला था। लोग धर्म के नाम पर पाखंड कर रहे थे।
वेमना ने इसे खुलकर चुनौती दी। उन्होंने कहा – “सिर्फ़ नाम से वैष्णव या वीरशैव होने से कोई सच्चा भक्त नहीं बनता।
ईश्वर मूर्तियों तक सीमित नहीं है। वो हमारे भीतर है।” उनका संदेश बिल्कुल वही था, जो उत्तर भारत में कबीर दे रहे थे। यानी – आडंबर और पाखंड से दूर रहो, आत्मा में परमात्मा को खोजो।
संत वेमना न केवल योगी थे, बल्कि महान कवि भी थे। उन्होंने तेलुगु भाषा में लगभग तीन हज़ार पद लिखे। ये पद सीधे-सपाट, जनभाषा में और सहज थे। उनके शब्द गहरे, व्यंग्यपूर्ण और विचारोत्तेजक होते। उदाहरण के लिए, वे कहते थे – “किताबें पढ़ लेने से कोई इंसान ऊँचा नहीं हो जाता। जैसे अपनी पीठ पर बोझ ढोता गधा कभी विद्वान नहीं बन सकता।”
धीरे-धीरे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। लोग उन्हें पागल समझकर पत्थर मारते, गाँव से निकाल देते। पर उन्हें इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ा। वो श्मशान में रहते, पेड़ों के नीचे बैठकर शिष्यों को शिक्षा देते।
अंत समय में उन्होंने मौन धारण कर लिया। जूठन खाकर, जमीन पर सोकर जीवन बिताने लगे। सन् 1537 विक्रमी में, 67 वर्ष की आयु में, उन्होंने आंध्र प्रदेश के पामूर गाँव के पास एक गुफा में समाधि ली। आज भी अनंतपुर जिले के कठारुपल्ली गाँव में उनकी समाधि और मंदिर स्थित है।
संत वेमना की यह कहानी हमें सिखाती है कि – चाहे इंसान कितनी भी बड़ी गलतियाँ कर ले, भोग और वासना में कितना भी डूब जाए, अगर उसके भीतर जागृति की एक चिंगारी बची है तो वह उसे सच्चे मार्ग पर ला सकती है।
वेमना ने वही किया – भोग से योग की ओर, वासना से वासुदेव की ओर, और अज्ञान से आत्मज्ञान की ओर उन्होंने अपना जीवन मोड़ा।
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