Drishya Dharma
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एकता में ही ताकत होती है
ज़रा सोचिए, अगर आप कोई काम अकेले करना चाहते हैं तो संभव है कि उस काम को करने में आपको परेशानियाँ आएं और ज़्यादा समय भी लगे। लेकिन वही काम अगर चार लोग मिलकर करें, तो वह काम जल्दी भी पूरा हो जाएगा और करने में मज़ा भी आएगा।
आप सभी को याद होगा कि हमारे बड़े-बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते थे – “मिलकर रहो, हमेशा साथ रहो, क्योंकि एकता में ही ताकत होती है।” कहते हैं, जिस घर में चार बेटे हों, उस घर के पिता को चिंता करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि वे चारों मिलकर सब कुछ संभाल लेंगे और पिता के बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। लेकिन अगर वही चार बेटे आपस में लड़ने लगें, एक-दूसरे से नफ़रत करने लगें, और साथ मिलकर रहना ही न चाहें... तो उस बूढ़े पिता की हालत कैसी होगी?
यह कहानी है एक बूढ़े किसान की, जिसके चार बेटे थे। किसान अपने बेटों से बहुत परेशान रहता था, क्योंकि वे हमेशा आपस में झगड़ते रहते थे। चारों बेटे एक-दूसरे से नफ़रत करते और कभी मिलकर नहीं रहते। किसान उन्हें बार-बार समझाता कि –
“अगर तुम सब साथ रहोगे तो तुम्हारी मुश्किलें आसान हो जाएंगी, कोई तुम्हें हरा नहीं पाएगा और तुम्हारी ताकत को तोड़ नहीं पाएगा।”
लेकिन बेटों ने पिता की एक न सुनी।
पिता ने कई बार कोशिश की, पर जब सभी प्रयास विफल हो गए, तो उसने सोचा – अब मुझे इन्हें एकता की ताकत समझानी ही पड़ेगी।
एक दिन किसान ने अपने चारों बेटों को बुलाया और कहा –
“तुम सब एक लाइन में खड़े हो जाओ।”
बेटे वैसे ही खड़े हो गए। किसान ने उनके हाथों में पतली-पतली लकड़ियों का एक बंडल पकड़ा दिया।
चारों बेटे हैरान होकर पूछने लगे –
“पिताजी, आप हमसे ये क्या करवा रहे हैं? आपने हमें लकड़ी का ये बंडल क्यों दिया?”
किसान बोला –
“आज तुम सबकी एक परीक्षा है। तुम्हें इस लकड़ी के बंडल को तोड़कर दिखाना है। इस परीक्षा से मैं देखना चाहता हूँ कि तुममें से सबसे ताकतवर बेटा कौन है।”
चारों बेटे चुनौती के लिए तैयार हो गए।
हर कोई यही सोच रहा था – आज मैं सबसे ताकतवर साबित हो जाऊँगा।
उन्होंने पूरी ताकत लगाई, पर कोई भी उस बंडल को तोड़ नहीं पाया।
काफी कोशिशों के बाद थक-हारकर उन्होंने गुस्से में बंडल को फेंक दिया और बोले –
“पिताजी, ये कैसी परीक्षा है? यह बंडल तो टूटने का नाम ही नहीं ले रहा।”
किसान मुस्कुराते हुए बोला –
“ठीक है, अगर तुम इस बंडल को नहीं तोड़ पा रहे तो इसे खोलो और लकड़ियों को एक-एक करके तोड़कर दिखाओ।”
चारों बेटों ने बंडल खोला और लकड़ियाँ एक-एक करके तोड़ने लगे।
अब वे आसानी से सभी लकड़ियाँ तोड़ बैठे।
खुश होकर उन्होंने पिता से कहा –
“देखिए पिताजी, हमने सारी लकड़ियाँ तोड़ दीं। अब आप बताइए कि विजेता कौन है?”
किसान ने गंभीर स्वर में पूछा –
“बताओ, इस परीक्षा से तुमने क्या सीखा?”
चारों बेटों ने कहा –
“जब लकड़ियाँ बंधी हुई थीं तो हममें से कोई भी उन्हें नहीं तोड़ पाया। लेकिन जैसे ही वे अलग हुईं, तो हम सबने आसानी से तोड़ दिया।”
तब किसान बोला –
“यही तो मैं तुम्हें हमेशा समझाने की कोशिश करता हूँ।
जब लकड़ियाँ एक बंडल के रूप में थीं, तब तक तुममें से कोई भी उन्हें तोड़ नहीं सका। लेकिन जब वे अलग हुईं, तो वे कमजोर पड़ गईं और आसानी से टूट गईं।
इसी तरह हमारा जीवन भी है। अगर तुम सब एकजुट रहोगे, एक-दूसरे का साथ दोगे, तो कोई तुम्हें हरा नहीं पाएगा। लेकिन अगर तुम आपस में बिखर जाओगे, तो तुम बहुत आसानी से हार जाओगे।”
यह सुनकर चारों बेटों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि उनके पिता हमेशा सही कहते थे – एकता में ही ताकत होती है।
उस दिन से चारों बेटे आपस में मिलकर रहने लगे और एक-दूसरे का सहारा बनने लगे। यह देखकर किसान बहुत खुश हुआ. इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा मिल-जुलकर रहना चाहिए।अगर हम सब एकजुट रहेंगे, तो दुनिया की कोई ताकत हमें हरा नहीं पाएगी।
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