Drishya Dharma
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संत नरसी मेहता की सम्पूर्ण जीवनगाथा
गाँधी जी भी इन्हीं के पद से प्रभावित हुए..
भारत की संत परंपरा अनंत है। इस पावन भूमि पर समय-समय पर ऐसे संत अवतरित हुए जिन्होंने अपनी साधना और भक्ति से समाज को दिशा दी। इन्हीं संतों में से एक थे गुजरात के संत नरसी मेहता। वे केवल एक कवि या गायक नहीं थे, बल्कि भक्ति के सूर्य थे, जिन्होंने अपने भजनों और पदों से समाज को करुणा, करुणाभाव और ईश्वरभक्ति का मार्ग दिखाया।
संत नरसी मेहता का जन्म गुजरात के जूनागढ़ जिले के पास स्थित तलाजा नगर में वैशाख शुक्ल सप्तमी (लगभग 1414 ई.) को हुआ। उनका जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, परंतु जब नरसी बहुत छोटे थे, तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। इस कारण वे अनाथ हो गए और उनका पालन-पोषण उनके बड़े भाई ने किया।
बाल्यकाल से ही नरसी का झुकाव सांसारिक कार्यों की ओर नहीं था। जबकि अन्य बच्चे खेलकूद और पढ़ाई में व्यस्त रहते, नरसी मंदिर के आँगन में बैठकर भगवान की मूर्तियों को निहारते और भक्ति में डूब जाते। धीरे-धीरे उनका यह स्वभाव परिवार और समाज को खटकने लगा। लोग उन्हें निकम्मा समझने लगे। लेकिन यह "निकम्मापन" ही उनके जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति सिद्ध हुआ, क्योंकि वही उन्हें भगवान की ओर खींच रहा था।
नरसी का हृदय जन्म से ही कोमल और भक्तिपूर्ण था। उन्हें लोक-लाज की परवाह न थी। जब भी समय मिलता, वे किसी मंदिर या नदी किनारे जाकर भगवान का स्मरण करने लगते। वे ढोलक और मंजीरा लेकर कृष्ण-लीलाओं का गुणगान करते। उनकी आँखों में आँसू छलक आते और शरीर भक्ति में झूम उठता।
समाज ने उन्हें ताने दिए, अपमानित किया, यहाँ तक कि निकम्मा और भार कहा। परंतु नरसी का मन विचलित नहीं हुआ। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था—श्रीकृष्ण की भक्ति था ।
समय बीता और नरसी का विवाह हुआ। उनकी पत्नी माणिकबाई धार्मिक और धैर्यशील थीं। परंतु उनके ससुराल पक्ष के लोग नरसी को पसंद नहीं करते थे। उन्हें लगता था कि नरसी कोई काम नहीं करते और घर के लिए बोझ हैं।
परिवार में आए दिन ताने और अपमान सहना उनकी नियति बन गई। कभी घर में अन्न का संकट होता, तो कभी वस्त्रों का। लेकिन इन विपत्तियों के बीच भी नरसी और उनकी पत्नी ने भक्ति का दीप जलाए रखा। माणिकबाई ने अपने पति की भक्ति को समझा और उनका साथ दिया।
जीवन की कठिनाइयों और उपेक्षा से आहत होकर एक दिन नरसी गिरनार पर्वत की ओर निकल गए। वहाँ उन्होंने कई दिनों तक कठोर उपवास कर भगवान शिव की उपासना की। उनकी तपस्या सफल हुई और अंततः भगवान शिव प्रकट हुए।
शिवजी ने उनसे वर माँगने को कहा। नरसी ने संसार के भौतिक सुखों को अस्वीकार कर केवल एक ही वरदान माँगा—श्रीकृष्ण भक्ति। वे चाहते थे कि उनका जीवन केवल प्रभु के नाम में बीते।
शिवजी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर बोले—“वत्स, आज से तुझे कृष्णलीला का साक्षात अनुभव होगा।” यह वरदान उनके जीवन का सबसे बड़ा turning point बना।
शिवजी के आशीर्वाद के बाद नरसी का जीवन भक्ति की अग्नि में और भी प्रज्वलित हो उठा। एक रात उन्होंने एक दिव्य अनुभव किया। उन्हें लगा जैसे वे वृंदावन में पहुँच गए हों। चारों ओर गोपियाँ रास नृत्य कर रही थीं और बीच में मुरलीधर श्रीकृष्ण खड़े थे। नरसी इस दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे।
यह अनुभव साधारण नहीं था। यह उनका ईश्वर-साक्षात्कार था। इसके बाद उनके भजन केवल गीत नहीं रहे, बल्कि अनुभव से उपजे अमृतवचन बन गए।
नरसी का जीवन लगातार विपत्तियों से घिरा रहा। परिवार और समाज ने उनका मजाक उड़ाया। कभी भोज के लिए सामग्री लाने को कहा जाता, कभी सामाजिक कर्तव्यों के लिए दबाव डाला जाता।
कहा जाता है कि एक बार गाँव के ठाकुर ने भोज के लिए अन्न और मिठाई की व्यवस्था नरसी से माँगी। निर्धन नरसी के पास कुछ भी न था। वे व्याकुल होकर भगवान से प्रार्थना करने लगे। तभी रात में भगवान कृष्ण व्यापारी का रूप धारण कर उनके घर आए और अनाज व मिठाइयों से घर भर दिया।
सुबह जब नरसी यह सामग्री लेकर पहुँचे, तो लोग दंग रह गए। सबने समझ लिया कि नरसी साधारण व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि भगवान के परम प्रिय भक्त हैं।
नरसी ने हजारों पद और भजन रचे। उनके भजनों में भक्ति का ऐसा रस था कि सुनने वाला आत्मविभोर हो जाता। उनके पद केवल ईश्वर स्तुति नहीं थे, बल्कि समाज के लिए भी आदर्श थे।
उनका सबसे प्रसिद्ध पद है—“वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाणे रे।” इसमें उन्होंने सच्चे भक्त का स्वरूप प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझता है और उनके कष्टों को दूर करने का प्रयास करता है। वह पराई स्त्री को माँ या बहन के रूप में देखता है और सदैव शुद्ध आचरण का पालन करता है। ऐसा भक्त लोभ, मोह और अहंकार से दूर रहता है तथा ईश्वर के नाम में निरंतर लीन होकर जीवन व्यतीत करता है।
यह पद महात्मा गांधी तक की प्रेरणा बना और आज भी पूरे भारत में गाया जाता है।
जीवन भर नरसी को दरिद्रता और भूख की मार झेलनी पड़ी। कई बार घर में अन्न का दाना भी न होता। पत्नी और बच्चे भूखे सो जाते, लेकिन नरसी का विश्वास कभी नहीं डिगा। वे मानते थे कि यदि भक्त सच्चे मन से ईश्वर को पुकारे, तो प्रभु स्वयं उसके योगक्षेम का पालन करते हैं।
उनके जीवन में कई बार ऐसे चमत्कार हुए जब अचानक कोई अजनबी अन्न या वस्त्र पहुँचा देता, या अप्रत्याशित रूप से मदद मिल जाती। नरसी इन सबको ईश्वर का खेल मानते और और भी अधिक भाव से भजन गाने लगते।
नरसी मेहता ने वृद्धावस्था तक भक्ति का दीप जलाए रखा। उनका शरीर कमजोर हो चुका था, लेकिन उनका मन कृष्ण के नाम में डूबा रहता। वे ढोलक-मंजीरा लेकर गली-गली घूमते और प्रभु का गुणगान करते।
जब उनका अंत समय आया, तो उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर आँखें मूँद लीं। कहा जाता है कि उसी क्षण उनके सामने भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्हें अपने लोक में ले गए। नरसी का सांसारिक जीवन समाप्त हुआ, परंतु उनकी भक्ति अमर हो गई।
संत नरसी मेहता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर भक्त के हर संकट में साथ देता है।
उनके पद और भजन आज भी गुजरात और पूरे भारत में गाए जाते हैं। उन्हें ‘आदि कवि’ और ‘भक्ति-युग का सूर्य’ कहा जाता है।
संत नरसी मेहता की जीवन कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, यदि विश्वास और भक्ति अडिग हो तो भगवान स्वयं सहायता करते हैं। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पाँच सौ वर्ष पूर्व था—
दूसरों के दुख को समझना ही भक्ति है। प्रभु के नाम में जीवन समर्पित करना ही सच्चा सुख है।
नरसी मेहता की वाणी आज भी गूंजती है और हर भजन सुनकर लगता है कि कृष्ण स्वयं नृत्य कर रहे हैं।
धन्यवाद
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