Drishya Dharma
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ऐसे संत जिन्होंने गृहस्थ जीवन को भी साधना का हिस्सा बना लिया
शिव के परम भक्त सन्त वसवेश्वर की प्रेरक कथा
गृहस्थ जीवन को कई लोग साधना में बाधक मानते हैँ. मगर हम उस संत की चर्चा कर रहे हैँ जिन्होंने गृहस्थ जीवन को ही साधना का हिस्सा बना लिया. बारहवीं शताब्दी यानी आज से लगभग 850 साल पहले, कर्नाटक में एक ऐसे महापुरुष ने जन्म लिया था, जिन्होंने शिव भक्ति, समाज सुधार और आध्यात्मिक जीवन को एक नई दिशा दी। आज भी उनकी शिक्षाएँ लोगों के जीवन में प्रकाश बनकर फैला रही हैं।
बहुत समय पहले, कर्नाटक के श्रीशैल क्षेत्र के पास इंगलेदवर गाँव में एक सुखी और संपन्न ब्राह्मण परिवार रहता था। उस परिवार के मुखिया मादिराजा और उनकी पत्नी मादलास्विका भगवान शिव के बहुत ही बड़े भक्त थे। वो रोजाना भगवान् बड़े आदर और प्रेम से भगवन शिव की सेवा व पूजा करते थे. प्रभु की कृपा से उनका जीवन हर साधन- संसाधन से पूर्ण था लेकिन फिर भी उन्हें एक बात की चिंता अक्सर रहती थी. और वो थी की वो निःसंतान थे। संतान प्राप्ति की इक्षा लिए उन्होंने भगवन शिव की बहुत भक्ति की. उनके तप और पूजा से प्रसन्न होकर आखिर एक दिन भगवान शिव जी ने उनकी पुकार सुन ली और शिव की कृपा से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई । और उस बालक का नाम रखा गया – वसवेश्वर।
वसवेश्वर के माता-पिता ने उनका पालन-पोषण बड़े ही प्रेम से किया। उन्हें अच्छी शिक्षा दी और उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। चौकाने वाली बात ये थी की इतनी सुख सुविधाओं में पलने के बाद भी उनके अंदर बचपन से ही शिव का नाम का जाप करते रहने की अनोखी लगन थी । वो अक्सर ध्यान में बैठे रहते और संसार की नश्वरता यानी जो आज है कल नहीं, इस पर विचार करते रहते तथा आत्मा के सत्य को समझने का प्रयास करते रहते थे।
जब वो आठ साल के हुए, तो उनके माता-पिता ने उनका उपनयन संस्कार कराने का निर्णय लिया। और एक भव्य यानी एक बहुत बड़े समारोह का आयोजन करवाया जिसमें दूर-दूर से रिश्तेदार आए। कल्याण के शासक विज्जल के दंडनायक वलदेव भी शामिल हुए। और वो वसवेश्वर की मधुरता और सुंदरता दोनों से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपने दामाद के रूप में अपनाने की इक्षा प्रकट की। लेकिन वसवेश्वर का मन संसार के संस्कारों में नहीं लगा। उन्होंने कहा – “सदाशिव की भक्ति ही जीवन का सच्चा मार्ग है। बाहरी संस्कार तो बंधन हैं। मैं इन्हें स्वीकार नहीं कर सकता।”
आचार्यों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे अपने फैसले पर अड़े रहे। और वो अपनी बहन नागलाम्बिका के साथ कूडल संगमेश्वर क्षेत्र चले गए। वहाँ एक तपस्वी शिवभक्त ने उन्हें शिवतत्व का भेद बताया। और फिर तपस्वी से शिवतत्व का ज्ञान पाकर वसवेश्वर ने शिव आराधना में अपने जीवन को समर्पित कर दिया।
कुछ समय बाद माता-पिता के आज्ञा का मान रखते हुए वसवेशवर ने विवाह यानि शादी के लिये हाँ कर दी और फिर उनके विवाह का आयोजन हुआ। उन्होंने इसे शिव की कृपा मानकर स्वीकार किया और गृहस्थ जीवन को भी साधना का हिस्सा बना लिया। वे अपनी पत्नी के साथ कल्याण लौटे और शिवभक्ति के प्रचार में जुट गए। एक समय आया जब दूर-दूर से संत और साधक उनसे मिलने आने लगे। और इसी तरह उनकी शिवभक्ति की ख्याति फैलती गई।
उनकी लोकप्रियता को देखकर, राजा विज्जल को उनसे जलन होने लगी थी। और ईर्ष्या के कारण उन्होंने वस्वेशवर को नीचा दिखाने की योजना बनाई। एक बार उसने मिट्टी और लकड़ी की दो शिवशरण प्रतिमाएँ बनवाईं और उन्हें वसवेश्वर के पास भेजा। और जब शिव भक्ति में डूबे रहने वाले सच्चे और भोले भक्त ने उन मूर्तियों को देखा तो उन्हें लगा की ये मुर्तिया साधारण नहीं, बल्कि शिव के सच्चे उपासक हैं, तो इनकी भी सेवा करना उसका परम कर्त्तव्य है ये सोच कर जब वसवेश्वर ने उन्हें सम्मान दिया और उनकी विधि पूर्वक पूजा की, तो वो मुर्तिया सचमुच के इंसान की तरह ज़िंदा हो उठीं. उनकी सच्ची सेवा भक्ति से उन मूर्तियों में प्राण आ गये थे। और जब राजा को इस बात का पता चला तो वो गुस्से से और भी ज़्यादा आग बबूला हो गया।
लेकिन वसवेश्वर का मन न तो मित्रता में बंधा, न शत्रुता में। वे सब में शिव का दर्शन करते थे – न कोई बड़ा, न कोई छोटा; न कोई ऊँचा, न कोई नीचा। वो हमेशा कहते थे – “सम्पूर्ण जगत शिवमय है।” उनकी करुणा इतनी गहरी थी कि एक बार उन्होंने नीची जाति के हरलय्या और उच्च जाति की मधुवय्या का विवाह करवा दिया। उनके ऐसा करने से समाज में भारी प्रतिक्रिया हुई । राजा ने मौका पाते ही उन्हें कठोर दंड दे दिया और राजकाज से अलग कर दिया। वसवेश्वर ने बहुत समझाया, पर कठोर राजा नहीं माना। आखिरकार वसवेश्वर ने मंत्री पद छोड़ दिया और पुनः शिवभक्ति में लीन हो गए।
उन्होंने ‘सर्वं शिवमयम्’ का संदेश दिया। उन्होंने कहा – “ईश्वर का मंदिर कोई इमारत नहीं, हमारा शरीर ही मंदिर है। सत्य बोलना स्वर्ग है, झूठ बोलना नरक। आत्मज्ञान ही सच्चा गुरु है।”
वो समाज में स्त्री-पुरुष समानता, आत्मा की स्वतंत्रता और शिवभक्ति का प्रचार करते रहे। उनके वचन ‘वचन-साहित्य’ के रूप में कन्नड़ भाषा में आज भी प्रसिद्ध हैं।
समय बीतने के साथ राजा विज्जल और उसके उत्तराधिकारियों की क्रूरता और बढ़ती गई। संत वसवेश्वर ने देखा कि लोग मोह-माया में उलझे हैं और सही रास्ते से भटक रहे हैं। तो उन्हें संसार की इस स्थिति को देख बहुत दुःख हुआ और उन्होंने सब से अलग होकर भगवान शिव में पूरी तरह लीन होने का फैसला कर लिया और एक दिन उन्होंने एक तालाब में जाकर जलसमाधी ग्रहण कर ली। ऐसा माना जाता है कि सम्वत् 1212 यानी आज से 855 साल पहले वो शिवचरणों में विलीन हो गए।”
आज भी कुडल संगमेश्वर क्षेत्र में उन्हें बहुत माना जाता है. संत वसवेश्वर ने वहीं अपने जीवन का अंत कर, लिंगैक्य यानि आत्मा का शिव से मिल जाने का परम सौभाग्य प्राप्त किया था। उनके भक्त उन्हें शिव का अवतार मानते हैं। भोग-विलास में रहते हुए भी उन्होंने मोह-माया से दूर रहकर वैराग्य का अनुभव किया। उन्होंने अपने भीतर शिव का सौंदर्य देखा और लोगों के लिए आध्यात्मिक जागरण का रास्ता खोला.
संत वसवेश्वर की यह कथा हमें सिखाती है कि संसार की चकाचौंध में रहते हुए भी आत्मा का प्रकाश खोजा जा सकता है। शिव भक्ति, सत्य, करुणा और समता का मार्ग आज भी हमें जीवन की कठिनाइयों से पार लगाता है। आइए, हम भी उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में शांति और सेवा का प्रकाश फैलाएँ।
धन्यवाद!
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