वह संत जो नाई का काम करते हुए प्रभु भक्ति में हुए लीन

    एक ऐसे संत के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्हें सेवा और हरिभजन में परम आनंद प्राप्त होता था।

    लगभग छह सौ साल पहले मध्य भारत के विख्यात क्षेत्र बांधवगढ़ में एक समृद्ध और खुशहाल  नगर बसा हुआ था। वहां के महाराजा वीरसिंह के शासनकाल में यह नगर दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। ऊँचे-ऊँचे महल, सुंदर बगीचे, स्वच्छ सरोवर और पवित्र मंदिरों से यह नगर सुसज्जित था। लेकिन इसी नगर के एक छोटे से हिस्से में, प्रकृति की हरियाली से घिरा हुआ, एक सादा-सा घर था — वही था संत सेन का निवास।

    संत सेन रोज़ भोर में उठकर स्नान-ध्यान करते और फिर राजा की सेवा में जाते। एक दिन, जब वे बाल बनाने का सामान लेकर राजमहल की ओर जा रहे थे. तो रास्ते में उन्हें संतों की एक टोली मिल गई। संतों को देखकर वे आत्मविभोर हो गए। उन्हें समय का ध्यान ही न रहा। वे संतों को अपने घर ले आए, उनका स्वागत किया और सत्संग में रम गए। कीर्तन और संतों की सेवा में वे ऐसा मग्न हुए कि उन्हें राजा की सेवा के समय का भान ही नहीं रहा।

    इधर राजा वीरसिंह अपनी सेवा के लिये सेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय बीतता गया, पर सेन नहीं पहुंचे। राजा चिंतित हो उठे। ऐसे समय में भगवान स्वयं भक्त की मर्यादा की रक्षा के लिए आगे आए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जिनकी सेवा में लोग लगे रहते हैं, वही भगवान संत सेन के रूप में राजा के पास पहुँच गए। उन्होंने मोरपंख, कुण्डल और वैभव त्यागकर सेन की वेशभूषा धारण की। शंख, चक्र, गदा, पद्म सब छोड़कर उन्होंने कंधे पर बाल बनाने की पेटी रख ली और राजा की सेवा में उपस्थित हो गए।

    राजा को सेवा करवाते समय इस बात का एहसास भी नहीं हुआ कि कोई साधारण व्यक्ति उनकी सेवा नहीं कर रहा, बल्कि स्वयं भगवान हैं। भगवान ने सेन के रूप में राजा को स्नान कराया, तेल लगाया और उनके रोज़ के कार्य पूरे किए। राजा ने संत सेन रूपी देव से कहा – “तुम यहीं रहो, मुझे अपनी सेवा से तृप्त करते रहो।" उन्हें क्या पता था कि जिनके चरणों की सेवा के लिए देवी-देवता तरसते हैं, वे स्वयं उनके सामने खड़े हैं।

    जब सेवा पूरी कर भगवान क्षणभर में अदृश्य हो गए तो राजा वीरसिंह उनके वियोग में व्याकुल हो उठे। दूसरी ओर संत सेन संतों के साथ सत्संग में मग्न थे। समय बीतने पर जब उन्हें याद आया कि वे सेवा में नहीं गए, तो वे चिंतित हो उठे। राजमहल पहुँचे तो देखा कि राजा पहले से ही संतों की सेवा कर रहे थे और अत्यंत प्रसन्न हैं। सैनिक ने बताया – “राजा आज बहुत खुश हैं।" संत सेन समझ गए कि भगवान ने उनके रूप में सेवा की है। वे रो पड़े, बोले – "मेरे कारण भगवान को कष्ट उठाना पड़ा। मैं कितना भाग्यहीन हूँ!"

    राजा ने संत सेन को गले लगाया और कहा – "आप मेरे गुरु हैं। आपके प्रभाव से मुझे भगवान का दर्शन मिला। मैं और मेरा परिवार जीवन भर आपके ऋणी रहेंगे।" इस घटना ने संत सेन के जीवन को वैराग्य से भर दिया। उन्हें समझ आया कि सेवा में समय का पालन आवश्यक है, लेकिन साथ ही, भगवान अपने भक्त की लाज रखते हैं।

    कुछ समय बाद संत सेन ने स्वामी रामानंद से दीक्षा ली और तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। वे पंढरपुर पहुँचे, जहाँ विठ्ठल की भक्ति में डूब गए। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर से सत्संग किया और उनके ज्ञान से प्रभावित होकर अनेक अभंग रचे। वे उन्हें अपना सखा मानते थे। उनके शब्द थे – "ज्ञानेश्वर विष्णु का अवतार हैं। उनके चरणों में स्नान करने से मुक्ति मिलती है।"

    संत सेन केवल भक्त नहीं, ज्ञानी भी थे। उनके सिखाए मार्ग में ज्ञान और भक्ति का समन्वय था। वे हर प्राणी में भगवान का दर्शन करते थे। पंढरपुर में उन्होंने विठ्ठल के संबंध में अनेक भक्ति गीत रचे, जिसमें प्रेम, आनंद और नाम-स्मरण की महिमा गाई। उनका विश्वास था कि राम और कृष्ण का नाम लेने से मन की वासनाएँ दूर होती हैं और पाप मिटते हैं।

    संत सेन का संतमत ज्ञान और भक्ति के समन्वय पर आधारित था। वे समस्त प्राणियों में भगवान का दर्शन करते थे और रामानंद के पदचिन्होँ पर चलने वाले थे। उनके सत्संग में प्रेम, सेवा और हरिनाम का गुणगान होता था। उन्होंने कहा – “कीर्तन प्रेम का सुख साम्राज्य है। आनंदपूर्वक हरि के गुणों का गान करना चाहिए।"

    पंढरपुर में उनके गीतों ने भक्तों को प्रेरित किया। उनका नाम संत समाज में आदर से लिया जाने लगा। संतों की संगति में रहकर वे हरिनाम जपते, कीर्तन करते और समाज में प्रेम का संदेश फैलाते रहे। उनका चित्त सदा विठ्ठल के चरणों में लगा रहता था। उनके नाम पर सेन-पथ का उल्लेख मिलता है, जो उनके प्रभाव का प्रमाण है।

    संत सेन का जीवन सिखाता है कि सच्ची सेवा, समय का पालन, संतों का संग और भगवान में विश्वास जीवन को दिव्यता से भर देते हैं। वे बताते हैं कि बाहरी वैभव मायने नहीं रखता; जो व्यक्ति संतोषी है, सेवा में रत है और भगवान का नाम जपता है वही वास्तविक संपत्ति का मालिक है।

    उनकी वाणी में यह विश्वास झलकता है – "राम नाम का ऐसा प्रताप है कि इससे सभी दोष मिट जाते हैं। सत्संग और हरिनाम से ही जीवन में सुख, शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।"

    यह थी संत सेन की प्रेरक जीवन यात्रा। एक साधारण नाई, जो सेवा में रत रहा, समय का पालन करता रहा, और संतों की संगति में भगवान का नाम जपता रहा – वही भगवान की कृपा से महान संत बना। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सेवा और भक्ति में ही सच्चा सुख है।

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