Drishya Dharma
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ऐसा संत जिसने भैंस को भी वेद मंत्र बोलने का सामर्थ्य प्रदान किया
संत ज्ञानदेव
हम ऐसे संत के जीवन की कहानी को जानेंगे जिसने भैंस को भी वेद मंत्र बोलने का सामर्थ्य प्रदान कराया.
चलते हैँ महाराष्ट्र के उस पावन भूमि की ओर, जहां भगवान ने अपने ज्ञान और भक्ति के अवतार के रूप में संत ज्ञानेश्वर का जन्म लिया। संत ज्ञानेश्वर, जिन्हें ज्ञानदेव के नाम से भी जाना जाता है. वे न केवल एक संत थे बल्कि ज्ञान, भक्ति और योग के अद्भुत समन्वय के प्रतीक भी थे। उनकी इस जीवन यात्रा से हमें भक्ति और ज्ञान की एकता का बेजोड़ संदेश मिलता है।
संत ज्ञानेश्वर का जन्म लगभग 750 साल पहले, सन् 1275 ईस्वी.में, भाद्रपद की कृष्ण अष्टमी की रात्रि को हुआ था। उनके पिता विट्ठल पंत और माता रुक्मिणी थीं। विट्ठल पंत एक विद्वान और धार्मिक ब्राह्मण थे, जिन्होंने वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। उनके पितामह गोविंद पंत भी अपने समय के प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते थे।
संत ज्ञानेश्वर का जन्म एक विशेष दिव्य संकेत के साथ हुआ। विट्ठल पंत ने स्वप्न में देखा कि उनकी पत्नी रुक्मिणी से एक महान अवतारी पुरुष प्रकट होंगे। इसी विश्वास के साथ उन्होंने विवाह किया और पुणे के निकट आलंदी में निवास किया। विट्ठल पंत ने अपने जीवन में कई तीर्थ यात्राएँ कीं और संन्यास के मार्ग पर चल पड़े। उनकी पत्नी रुक्मिणी ने भी तपोबल से जीवन व्यतीत करना प्रारंभ किया।
ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन – निवृत्तिनाथ, सोपानदेव और मुक्तावाई – का पालन-पोषण ऐसे समय हुआ जब उनके माता-पिता संन्यास के मार्ग पर चले गए। इस प्रकार ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन अनाथ हो गए। उन्हें जीवन यापन के लिए भिक्षाटन करना पड़ता था। इन कठिन परिस्थितियों ने उनके मन में संसार से विरक्ति और आत्मज्ञान की प्यास को और अधिक गहरा कर दिया।
ज्ञानेश्वर का बचपन अद्भुत घटनाओं से भरा था। पैठण के ब्राह्मणों ने उन्हें उपनयन संस्कार के लिए शुद्धि की एक कठिन परीक्षा ली। उन्हें और उनके भाई-बहन को चारों लोकलज्जा का परित्याग कर, कुत्ते, चांडाल और अन्य सभी प्राणियों के साथ भूमिपर लेट कर प्रणाम करना था। ज्ञानेश्वर ने यह परीक्षा बिना किसी भय और संकोच के पूरी की। इस घटना से उनके अद्भुत आत्मबल और ईश्वर भक्ति का प्रमाण मिलता है।
उनकी शिक्षा में उनके पिता और माता, दोनों का प्रभाव स्पष्ट था। निवृत्तिनाथ ने रामकृष्ण मंत्र की दीक्षा ली और कृष्णभक्ति का प्रचार करने का संकल्प लिया। सोपानदेव ने भजनों के माध्यम से लोगों को मार्गदर्शन देना स्वीकार किया। मुक्तावाई ने अपने जीवन को पूर्णत: साध्वी और समाजसेवी बनाया। और ज्ञानेश्वर ने कहा कि “मैं समस्त शास्त्रों का ज्ञाता हूँ।”
ज्ञानेश्वर बचपन से ही अद्भुत योगिक चमत्कार करने में सक्षम थे। एक उदाहरण के अनुसार, उन्होंने एक भैंस की पीठ पर हाथ रखकर उसे वेद मंत्र पढ़ने में समर्थ कर दिया। लोग चकित रह गए कि कैसे एक प्राणी, जिसकी चेतना सामान्य मानी जाती है, वेद मंत्रों का उच्चारण कर सकता है। इस चमत्कार ने लोगों में उनके प्रति विश्वास और भक्ति की भावना बढ़ा दी।
ज्ञानेश्वर ने अपने जीवन में नारायण भक्ति और विष्णु उपासना का प्रचार किया। उनका मानना था कि समस्त प्राणी बिना किसी भेदभाव के मोक्ष प्राप्ति के योग्य है। उन्होंने भूत-प्राणी में पारस्परिक प्रेम और सहानुभूति की भावना जगाई। उनके जीवन का उद्देश्य पापरूपी अंधकार को नष्ट कर, जीवों को आत्मज्ञान और भक्ति की ओर प्रेरित करना था।
ज्ञानेश्वर ने केवल भक्ति और योग का प्रचार ही नहीं किया, बल्कि ज्ञान की गहनता में जाकर भगवद्गीता का व्याख्यात्मक ग्रंथ ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखा। यह ग्रंथ भक्ति और ज्ञान का अद्भुत मिश्रण है। उन्होंने कहा कि गुरु के चरणों में मस्तक रखने से आत्मज्ञान प्राप्त होता है, और हरि के नाम का उच्चारण करने से अनंत पाप नष्ट हो जाते हैं।
उनकी रचनाएँ – भावार्थदीपिका (ज्ञानेश्वरी), अमृतानुभव, हरिपाठ, चागदेव पासठी – आज भी भक्तों और साधकों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं।
ज्ञानेश्वर ने निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, मुक्तावाई, नामदेव और अन्य संतों के साथ भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्रा की। उन्होंने उज्जैन, प्रयाग, काशी, अयोध्या, गया, गोकुल, वृंदावन, गिरनार आदि स्थलों पर भक्ति और ज्ञान का प्रचार किया। उनकी यात्राओं का उद्देश्य था लोगों को भवसागर से पार लगाने का मार्ग दिखाना।
नेवासे में उन्होंने एक स्त्री को मृत पति का शरीर गोद में लेकर विलाप करते देखा। उन्होंने उस मृत पुरुष को प्राणों से पुनर्जीवित किया और लोगों को सच्चिदानन्द के रहस्य और आत्मज्ञान का अनुभव कराया। इस चमत्कार ने समाज में उनके महात्म्य और दिव्यता को और अधिक प्रमाणित किया।
संत ज्ञानेश्वर ने 21 वर्ष, 3 माह और 8 दिन की आयु में समाधि ली। उन्होंने मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी, संवत १३५३ वि. में आलंदी में जीवित समाधि ली। उनके साथ निवृत्तिनाथ, सोपानदेव और मुक्तावाई ने भी महाप्रयाण किया।
समाधि के समय भगवान विट्ठल ने उनको दर्शन देकर उनका सम्मान किया। नामदेव और अन्य संत उनकी समाधि के समय उपस्थित थे। ज्ञानेश्वर ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी ज्ञान, भक्ति और करुणा का संदेश दिया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा साधक, चाहे कितने ही कठिन समय में क्यों न हो, अपने ज्ञान और भक्ति के माध्यम से समाज और प्राणी मात्र के कल्याण में लगा रह सकता है।
उन्होंने कहा कि भक्ति के बिना ज्ञान व्यर्थ है; तीर्थ, ब्रत, नियम और सिद्धियाँ भी भक्ति के बिना सार्थक नहीं होतीं। उनका मार्गदर्शन यह भी है कि हरि का नाम सर्वोपरि है और उसका निरंतर स्मरण पाप को नष्ट कर आत्मा को प्रकाशित करता है। उन्होंने सभी प्राणियों को मोक्ष के योग्य माना और भेदभाव छोड़कर सबमें समान दृष्टि रखने की सीख दी। ज्ञानेश्वर ने योग और भक्ति के समन्वय पर विशेष जोर दिया और जीवन में साधना, ध्यान और भक्ति का संतुलित मार्ग अपनाने की सलाह दी।
संत ज्ञानेश्वर का जीवन हमें यही संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान और भक्ति, समाज और प्राणी मात्र के कल्याण में निहित है। उनका अद्भुत जीवन, चमत्कार, रचनाएँ और शिक्षाएँ आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक हैं।
आइए, हम भी उनके पदचिन्हों पर चलते हुए अपने जीवन में ज्ञान, भक्ति और करुणा को अपनाएँ और समाज में उज्ज्वल परिवर्तन लाएँ।
धन्यवाद।
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