जो होगा देखा जायेगा

    यह एक गहरी और विचारशील कहानी है। जीवन में लोग अक्सर यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि – “जो होगा, देखा जाएगा।” ये शब्द सुनने में आसान लगते हैं, लेकिन हकीकत में कई बार इंसान को गहरी परेशानियों में डाल देते हैं। क्योंकि यह सोच इंसान को लापरवाह और आलसी बना देती है। और जब इंसान भविष्य की तैयारी नहीं करता… तो उसका वर्तमान तो बिगड़ता ही है, साथ ही उसका भविष्य भी बर्बाद हो जाता है।

    यह कहानी हमें यही सिखाती है कि भविष्य की सोच क्यों ज़रूरी है और “जो होगा, देखा जाएगा” जैसी सोच क्यों खतरनाक साबित हो सकती है। तो बहुत समय पहले की यह बात है। हरे-भरे खेतों से घिरे एक गाँव के पास एक सुंदर और बड़ा तालाब था।

    तालाब का पानी नीला, साफ़ और गहरा था। उसमें कमल के फूल खिले रहते और किनारों पर हरी काई बिछी रहती थी।

    उस तालाब में तीन मछलियाँ रहती थीं। ये तीनों आपस में बहुत अलग स्वभाव की थीं। पहली मछली का नाम था अनागतविधाता, जिसका स्वभाव बड़ा समझदार और दूरदर्शी था। वह हमेशा पहले से सोचकर आने वाले समय की तैयारी कर लेती थी और किसी भी मुसीबत से बचने का उपाय पहले से ढूँढ़ लेती थी। दूसरी मछली थी प्रत्युत्पन्नमति, जो हालात देखकर तुरंत सही निर्णय लेने में माहिर थी। परिस्थिति कैसी भी हो, वह तुरंत बुद्धि लगाकर रास्ता निकाल लेती थी। वहीं तीसरी मछली का नाम था यद्भविष्य। उसका स्वभाव बिल्कुल अलग था—वह न तो भविष्य की सोचती थी और न ही हालात को गंभीरता से लेती थी। उसका एक ही वाक्य हमेशा सबके सामने आता—“जो होगा, देखा जाएगा।”

    ये तीनों मछलियाँ उस तालाब में दिनभर तैरती, खेलती, भोजन ढूँढतीं और अपने जीवन का आनंद लेतीं। एक दिन दोपहर के समय, कुछ मछुआरे उस तालाब के पास आ पहुँचे। उन्होंने तालाब को देखा तो उनकी आँखें चमक उठीं।

    मछुआरा 1 (लालच से):

    "अरे वाह! इस तालाब में तो ढेर सारी मछलियाँ हैं। अगर हम यहाँ जाल डालें तो बहुत फायदा होगा।"

    मछुआरा 2 (सिर हिलाते हुए):

    "हाँ, तुम ठीक कहते हो। आश्चर्य है कि आज तक हमने इस तालाब में मछली नहीं पकड़ी।

    कल सुबह यहाँ आकर जाल डालेंगे। आज तो हमारे पास दूसरे तालाब से ही काफ़ी मछलियाँ हो चुकी हैं।"

    ऐसा कहकर मछुआरे आपस में बातें करते हुए चले गए। लेकिन… ये सारी बातें अनागतविधाता ने सुन लीं। जैसे ही मछुआरे चले गए, अनागतविधाता घबराई हुई अपनी साथी मछलियों के पास पहुँची।

    "दोस्तों! मैंने अभी मछुआरों की बातें सुनी हैं। वे कल सुबह यहाँ जाल डालने आएँगे। अगर हम आज रात ही इस तालाब से निकलकर किसी दूसरे तालाब में नहीं गए, तो कल तक हम सब मारी जाएँगी। हमें तुरंत फैसला लेना होगा।" यह सुनकर प्रत्युत्पन्नमति ने भी सिर हिलाया। "हाँ, तुम्हारी बात सही है।

    कल का इंतज़ार करना मूर्खता होगी। हमें आज ही इस तालाब को छोड़ देना चाहिए। अभी भी समय है, पास ही दूसरा तालाब है जहाँ हम सुरक्षित रह सकते हैं।" लेकिन जैसे ही तीसरी मछली यद्भविष्य ने यह बातें सुनीं, वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

    "अरे मूर्खों! तुम दोनों इतनी जल्दी डर क्यों रही हो? क्या तुम राह चलते हर इंसान की बातों पर यक़ीन कर लोगी? यह तालाब हमारे पूर्वजों का है। हम यहीं पैदा हुईं, यहीं हमारा परिवार है।

    मैं कहीं नहीं जाऊँगी। अगर हमारा भाग्य अच्छा हुआ तो कुछ नहीं होगा। और अगर भाग्य खराब हुआ… तो चाहे जहाँ जाओ, मौत से कोई नहीं बच सकता। इसलिए मैं तो कहती हूँ—जो होगा, देखा जाएगा!"

    यद्भविष्य की यह बातें सुनकर दोनों मछलियाँ निराश हुईं। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

    "ठीक है, अगर तुम हमारे साथ नहीं चलना चाहतीं, तो यह तुम्हारा फैसला है। हम तो आज ही अपने परिवार को लेकर इस तालाब को छोड़ देंगे।" रात होते ही अनागतविधाता और प्रत्युत्पन्नमति अपने परिवार के साथ एक छोटी सी नहर के रास्ते दूसरे तालाब में चली गईं। उनके दिल में डर था, लेकिन उम्मीद भी थी।

    दूसरी ओर यद्भविष्य अपने परिवार के साथ उसी तालाब में आराम से सो गई। उसके चेहरे पर ज़रा भी चिंता नहीं थी। वह बस यही सोच रही थी—“कल जो होगा देखा जाएगा।”

    अगली सुबह जैसे ही सूरज निकला, वह मछुआरे अपना जाल लेकर उस तालाब में पहुँच गए। उन्होंने बिना देर किए जाल फैलाया। पलभर में पूरा तालाब हलचल से भर उठा। मछलियाँ तड़पने लगीं, छटपटाने लगीं… कुछ ही देर में पूरा तालाब खाली हो गया। सभी मछलियाँ पकड़ ली गईं—

    उनमें यद्भविष्य और उसका पूरा परिवार भी शामिल था। उन्हें बाहर निकालकर मछुआरों ने बेच दिया।

    और इस तरह यद्भविष्य की ज़िद और लापरवाही ने उसकी जान ले ली। दूसरी ओर अनागतविधाता और प्रत्युत्पन्नमति अपने परिवार सहित पास के तालाब में सुरक्षित थीं। वहीं वे खुशी-खुशी जीवन बिताने लगीं।

    यही है अद्भुत कहानी। तीनों मछलियों में से दो ने समझदारी और दूरदृष्टि दिखाई और बच गईं। लेकिन तीसरी मछली की ज़िद, आलस्य और “जो होगा देखा जाएगा” वाली सोच ने उसकी जान ले ली।

    इसलिए कहा जाता है— हमें हमेशा भविष्य की तैयारी करनी चाहिए। कल के लिए सही फैसले समय पर लेने चाहिए। अगर हम सिर्फ़ भाग्य पर भरोसा करेंगे और लापरवाह बनकर बैठेंगे… तो नुकसान उठाना तय है।

    इस कहानी से हमें कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं। सबसे पहले, भविष्य की योजना बनाना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जो पहले से तैयारी करता है, वही आने वाले संकट से सुरक्षित रहता है। दूसरी बात, आलस्य और लापरवाही से हमेशा नुकसान होता है—क्योंकि “जो होगा, देखा जाएगा” वाली सोच हमें मुसीबत में डाल देती है। और सबसे बड़ी बात, सही समय पर सही फैसला लेने वाला.

    धन्यवाद

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