योगिराज भर्तृहरि की प्रेरक जीवन कथा: भोग और वैभव से उठकर योग का मार्ग चुना

    एक ऐसी कहानी जो आपको आत्मचिंतन, त्याग और वैराग्य का असली अर्थ समझाती है. यह कहानी है महान योगी भर्तृहरि की – जिन्होंने भोग और वैभव से उठकर योग और आत्मज्ञान का मार्ग चुना।

    तो आइए… मन को शांत करें.. और जानिए हमारे साथ उनके जीवन की अद्भुत गाथा…

    बहुत समय पहले उज्जयिनी नगरी में महाराजा भर्तृहरि का जन्म हुआ। वे पराक्रमी राजा थे। उनका राज्य संपत्ति, सेना, वैभव और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण था। उनके छोटे भाई विक्रमादित्य भी उनके साथ राज्य का संचालन करते थे। परंतु भर्तृहरि का मन सुख- सुविधा के भोगों में उलझा हुआ था।

    वे अपनी रानी पिंगला के रूप-सौंदर्य में इतने रमे थे कि राज्य, प्रजा, कर्तव्य सब कुछ भूल बैठे थे। हर समय बस रानी का सौंदर्य उनकी आँखों में बसा रहता। दिन-रात उसका ध्यान उन्हें घेरे रहता था। इतना ही नहीं पिंगला के प्रेम में वो इस कदर मग्न रहते थे कि शत्रु आक्रमण का डर भी उन्हें विचलित न कर सका।

    विक्रमादित्य उन्हें बार-बार समझाते – भैया! राज्य और प्रजा का ध्यान भी जरूरी है…” लेकिन भर्तृहरि का मन तो प्रेम और विलास में डूबा था। वो कहाँ किसी की बात सुनने वाले थे। ..

    इसी बीच एक दिन दरबार में एक योगी आए, जिनके हाथ में एक अमर फल! था। कहा जाता है कि उसे खाने से शरीर कभी बूढ़ा नहीं होता, और जीवन अमर हो जाता है। और फिर योगी ने सोचा – “यह फल महाराजा भर्तृहरि के लिए ही है। यदि वो अमर रहेंगे तो राज्य में सुख और शांति बनी रहेगी।” इसलिए वो उस फल को लेकर दरबार पहुंचे थे। योगी ने जब राजा को फल का खासियत बताई तो

    राजा ने फल देखकर सोचा – “यह फल तो रानी पिंगला के लिए है। वही मेरे जीवन का आधार है।” और फिर उन्होंने वह फल योगी से लेकर रानी को दे दिया।

    लेकिन… रानी का मन पहले ही किसी और में उलझ चुका था। उसने वह फल छिपाकर अश्वशाला के अध्यक्ष को दे दिया। वह व्यक्ति भी एक वेश्या में आसक्त था। उसने वही फल वेश्या को दे दिया। वेश्या ने सोचा – “मैं तो पाप में डूबी हूँ। यदि अमर हो गई तो कितने लोगों को दुःख में डाल दूँगी।” तो उसने वो फल लाकर राजा को लौटा दिया! और जब वो फल घूम कर राजा के पास वापस आया तो राजा के मन में कई सवाल उठने लगे और फिर शुरू हुई इस रहस्य की जाँच.

    और जब राजा को रहस्य का सच मालूम चला तो मानो की उनका संसार ही लूट गया हो, तब राजा का हृदय पूरी तरह टूट गया। उन्हें समझ आ गया कि जिस मोह में वे डूबे थे वही उनका सबसे बड़ा बंधन बन गया। प्रेम झूठा था। विश्वास टूटा। मन विचलित हो गया।

    राजा ने स्वयं से कहा – “हमने भोग नहीं किए… भोगों ने हमें भोग लिया। हमने तपस्या नहीं की… तप ने हमें तपाया।

    समय बीत गया… पर हमारी तृष्णा कभी समाप्त नहीं हुई… और फिर उन्होंने ठान लिया – अब वे भोगों से मुक्त होकर वैराग्य का मार्ग अपनाएँगे।

    रानी पिंगला राजा के पैरो में गिर पड़ी और रो-रोकर बोली – प्राणनाथ! आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकती!”

    लेकिन भर्तृहरि ने दृढ़ स्वर में कहा – माता! तू मेरी माता है। मेरे वैराग्य में सहायक होना तेरा धर्म है। शुभ कार्य में बाधा नहीं डालनी चाहिए।” यह कहकर उन्होंने राजमहल छोड़ दिया।और शिव का स्मरण करते हुए वे अपने राज्य की सीमा पार कर तपस्या की राह पर निकल पड़े।

    राजा भर्तृहरि महायोगी गोरखनाथ के पास पहुँचे और दीक्षा ली। उन्होंने जटा, भस्म, रुद्राक्ष, मेखला पहनकर योग मार्ग पर चलना शुरू किया।और वो शिव के ध्यान में लीन हो गए। अब उनकी वाणी में शांति झलकती थी। उनका मन पूरी तरह स्थिर हो गया था । वो कहते – हमने भोग नहीं किए… भोगों ने हमें भोग लिया। हमने तप नहीं किया… तप ने हमें तपाया।

    काल रुका नहीं… काल ने हमें नष्ट कर दिया। तृष्णा समाप्त नहीं हुई… तृष्णा ने हमें जीर्ण कर दिया।”

    वो सच्चे योगी बन गए। उनका जीवन तप, साधना और आत्मज्ञान में समर्पित हो गया।

    योगिराज भर्तृहरि केवल योगी ही नहीं, महान कवि भी थे। उन्होंने शृंगारशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक जैसे ग्रंथों की रचना की। उनका दर्शन बताता है कि सच्ची शांति केवल वैराग्य में है। उन्होंने शब्द-ब्रह्म की साधना की और शिवभक्ति के साथ आत्मज्ञान का संदेश दिया।

    उनकी समाधि आज भी अलवर के घने जंगल में मानी जाती है। वहाँ एक अखंड दीप जलता है, जिसे ‘भर्तृहरि की ज्योति’ कहा जाता है। उनकी उपासना और तपस्या आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

    उन्होंने जन कल्याण हेतु बताया कि भोगों में रोग का भय छिपा होता है, ऊँचे कुल में पतन का डर रहता है और धन में राजा का भय सताता है। मौन रहने में दीनता का एहसास होता है, बल में शत्रु का डर रहता है और रूप में बुढ़ापे का भय मन में बैठा रहता है। शास्त्रों में वाद-विवाद का संकट, गुणों में दुष्ट लोगों का खतरा और शरीर में मृत्यु का डर हमेशा बना रहता है। इस प्रकार संसार की हर वस्तु किसी न किसी रूप में भय उत्पन्न करती है; केवल वैराग्य ही ऐसा मार्ग है जो मनुष्य को निर्भय बना सकता है।

    साथियों, योगिराज भर्तृहरि की यह कथा हमें ये सिखाती है कि सुख और वैभव क्षणिक हैं। वास्तविक आनंद तो आत्मा की शांति में है। वैराग्य का मतलब दुनिया से भागना नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति को पहचान कर परम सत्य की ओर बढ़ना है।

    शिव की कृपा सदैव आपके साथ हो…

    धन्यवाद |

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