Drishya Dharma
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आचार्य रामानुज: जीव अणु है और भगवान विभु
ये ऐसे महापुरुष की गाथा है, जिन्होंने बताया कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता बड़ा सरल है. वरना पहले तो यही माना जाता था कि भगवान को सिर्फ़ बड़े विद्वान, तपस्वी या योगी ही पा सकते हैं। मगर एक ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने कहा – भगवान तो सबके हैं। वो तो प्रेम और शरणागति से ही मिलते हैं।
अब हम आपको उस महापुरुष की कहानी बताने जा रहे हैं… जिन्होंने पूरे भारत को भक्ति का असली मतलब समझाया… जिन्होंने दिखाया कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ़ शास्त्र पढ़ने या ज्ञान के गर्व से नहीं, बल्कि प्रेम और शरणागति से खुलता है। इतना ही नहीं उस महापुरुष ने अपने गुरु को दिए वचन को भी निभाया और एक उत्तराधिकारी के रूप में उनके अंतिम संस्कार के सभी नियम-कर्म पूरे किये।
अब आचार्य रामानुज की गाथा का अध्ययन करते हैं. दक्षिण भारत के तिरुकुदूर नामक गाँव में, लगभग 1008 साल पहले, एक बालक का जन्म हुआ। जिसके पिता का नाम केशव भट्ट सोमयाजी, और माता का नाम – कान्तिमती था। रामानुज के सर से पिता का साया बचपन में उठ गया. जी हाँ बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया, पिता के देहांत हो जाने के बाद उनकी माँ ने उन्हें बड़े प्रेम से पाला। रामानुज बचपन से ही असाधारण व्यक्तित्व के धनी और बुद्धिमान थे। जहाँ अन्य बच्चे खेलों में व्यस्त रहते, वहीं ये भगवान के भजन और शास्त्रों में खोए रहते। समय अपनी से चलता रहा और बढ़ते समय के साथ ही अब रामानुज का भी बचपन बीत गया और वो अब बड़े हो चुके थे किशोर अवस्था में आने के बाद वो कांची पहुँचे और वहाँ एक प्रसिद्ध विद्वान यादव प्रकाश से वेद-शास्त्र पढ़ने लगे।
रामानुज की बुद्धि इतनी तीव्र थी कि वे अपने ही गुरु की व्याख्या में गलतिया ढूँढ लेते थे। जो उनके गुरु को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। धीरे-धीरे ईर्ष्या इतनी बढ़ी कि यादव प्रकाश ने रामानुज को रास्ते से हटा देने की साज़िश तक रच डाली।
एक दिन उनके गुरु यादव प्रकाश ने काशी की यात्रा का बहाना बनाकर, रामानुज को घने जंगल में ले जाकर मार डालने की योजना बनाई लेकिन… भगवान की कृपा हमेशा अपने भक्तों पर होती है। रामानुज को अपने गुरु के इस षड़यंत्र का पहले से आभास हो गया। उन्होंने रातभर वरदराज पेरुमल का भजन किया। बताया गया है कि भगवान स्वयं माता लक्ष्मी के साथ प्रकट हुए, और उन्हें अपनी माया से सुरक्षित कांची पहुँचा दिया।
इस घटना के बाद, रामानुज के हृदय में भक्ति की भावना और प्रबल हो गई। उसके बाद रामानुज ने गृहस्थ जीवन भी अपनाया, उन्होंने एक सुब्दर शुशील कन्या से विवाह किया… लेकिन उनके मन में प्रभु भक्ति की लगन इतनी प्रबल थी कि उनका मन गृहस्थ जीवन में लगा ही नहीं. हर समय उनके भीतर एक ही आवाज़ गूंजती रहती – “जीवन भगवान की सेवा में लगाना चाहिए।” इसी बीच एक घटना घटी – महान आचार्य यामुनाचार्य (आलवन्दार) का अंत समय आ गया था।
उन्होंने रामानुज को अपना उत्तराधिकारी मानकर याद किया। पर अफसोस… जब तक रामानुज श्रीरंगम पहुँचे, तब तक यामुनाचार्य का देहांत हो चुका था। रामानुज ने उनके शव को देखा… और देखा कि यामुनाचार्य की तीन उँगलियाँ मुड़ी हुई हैं। ये देख रामानुज तुरंत समझ गए – ये तीन अधूरे संकल्प हैं।
उन्होंने अपने गुरु के शव के आगे वहीं प्रतिज्ञा की कि मैं ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखूँगा।, विष्णु सहस्रनाम की व्याख्या करूँगा।और आलवार संतों के भजनों को जन-जन तक पहुँचाऊँगा। जैसे ही उन्होंने ये प्रण लिया – यामुनाचार्य की तीनों उँगलियाँ अपने आप सीधी हो गईं। माना जाता है कि वह कोई दिव्य संकेत था – अब रामानुज को ही भक्ति आंदोलन आगे बढ़ाना था।
रामानुज ने गृहस्थ जीवन त्याग कर सन्यास की दीक्षा लेली। और फिर वो कहलाए – आचार्य रामानुज। उनके गुरु ने उन्हें एक गुप्त मंत्र दिया – “ॐ नमो नारायणाय” और ये आदेश दिया – कि वो इसके बारे से किसी को न बतायें ।
मगर रामानुज का हृदय करुणा से भरा था। वो सोचने लगे – अगर इस मंत्र के सुनने मात्र से जीव मुक्त हो सकता है, तो इसे छुपाकर क्यों रखा जाए? फिर क्या था उन्होंने मंदिर की ऊँची छत पर चढ़कर, हजारों लोगों को यह मंत्र सुना दिया।
और फिर जब गुरु ने कहा – “तुम जानते हो इसके लिए तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा?” तो रामानुज ने विनम्रता से कहा – अगर मेरे माध्यम से अनगिनत लोग भगवान के भक्त बनकर मुक्ति पाएँगे, तो मैं लाखों नरक भोगने को भी तैयार हूँ। गुरु उनकी निस्वार्थ भावना से द्रवित हो गए। उन्होंने रामानुज को गले लगाकर आशीर्वाद दिया। इसके बाद रामानुज की कीर्ति दूर-दूर तक फैलने लगी। इसके साथ ही उनके कई शत्रु भी बढ़े। एक बार श्रीरंगम मंदिर के ही कुछ लोग उनके खिलाफ हो गए और उनकी हत्या की योजना बनाई जाने लगी। लेकिन भगवत कृपा से सभी की ये योजना विफल हो गई.
रामानुज ने कभी हार नहीं मानी। वो पूरे भारत का भ्रमण करने लगे – अनेकों मंदिरों का उद्धार किया, मूर्तियों की पुनः प्राण प्रतिष्ठा करवाई, और भक्ति का संदेश फैलाया।
उस समय के साशकों में चोल नरेश कुलोत्तुंग कट्टर शिवभक्त थे। वे वैष्णवों को सताने लगे। स्थिति इतनी कठोर हुई कि रामानुज को श्रीरंगम छोड़कर मैसूर राज्य में शरण लेनी पड़ी।
वहाँ के राजा विष्णु भक्त थे। उन्होंने रामानुज का बहुत सम्मान किया। रामानुज ने वहाँ 12 वर्ष बिताए और भक्ति का प्रचार जारी रखा। रामानुज ने जो सिखाया, उसका सार बड़ा सरल था – कि भगवान ही पुरुषोत्तम हैं। जीव उनके सेवक हैं। और भगवान की शरणागति ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।
उन्होंने कहा – जीव अणु है, और भगवान विभु। अणु कभी विभु नहीं हो सकता। मुक्ति का अर्थ है – भगवान का दास्य स्वीकार करना।” उनकी व्याख्या ने भक्ति को आमजन तक पहुँचा दिया। अब ईश्वर सिर्फ विद्वानों की पुस्तकों में नहीं, बल्कि साधारण भक्तों के हृदय में बसने लगे।
रामानुज ने 120 वर्षों का लंबा जीवन जिया। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर श्रीभाष्य, गीता पर भाष्य, और अनेक ग्रंथ लिखे। भक्ति-रस से भरे गद्य आज भी भक्तों की आँखें नम कर देते हैं। वो अपने अंतिम समय में भी यही कहते रहे कि प्रभु, मुझे ऐसा बना दीजिए कि मैं हर परिस्थिति में आपका ही सेवक बना रहूँ। आपके चरणों में ही मेरी एकमात्र शरण रहे।
दआचार्य रामानुज का जीवन हमें ये सिखाता है – कि भक्ति का सार प्रेम और करुणा है। और भगवान तक पहुँचने का रास्ता ज्ञान के गर्व से नहीं, बल्कि शरणागति से मिलता है और सच्ची मुक्ति वही है जब हम कहें – प्रभु, मैं आपका दास हूँ, आपकी शरण में हूँ।
धन्यवाद |
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