Drishya Dharma
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बगुला और केकड़ा – जहाँ बुद्धि है, वहाँ जीत है
बहुत समय पहले की बात है। एक शांत सा तालाब था, जिसमें हरी-भरी घास के झुरमुट, रंग-बिरंगे फूलों की महक और चारों ओर फैली हरियाली उसे और भी खूबसूरत बना देती थी। तालाब का पानी साफ और ठंडा था। सूरज की किरणें जब उस पर पड़तीं, तो ऐसा लगता जैसे पानी पर सोने की परत चढ़ गई हो। उस तालाब में तरह-तरह की मछलियाँ, मेंढक, कछुए और केकड़े रहते थे। सब अपने-अपने जीवन में खुश थे।
तालाब के किनारे एक बगुला भी रहता था। बगुले की आँखें तेज़ थीं, उसकी चोंच लंबी और नुकीली थी, और वह अक्सर घंटों तक पानी के किनारे खड़ा होकर शिकार की तलाश करता। पहले तो वह बड़ी आसानी से मछलियाँ पकड़ लेता और अपना पेट भर लेता था। लेकिन समय बीतता गया, बगुला बूढ़ा होने लगा। उसकी ताक़त पहले जैसी न रही। अब वह उतनी तेज़ी से शिकार नहीं कर पाता था। कभी-कभी पूरा दिन बीत जाता और उसके पेट में एक दाना भी नहीं पहुँचता।
धीरे-धीरे बगुले की हालत ख़राब होने लगी। उसके पंख ढीले पड़ गए, आँखों की चमक फीकी होने लगी और भूख से उसका शरीर कमज़ोर हो गया। अब उसके सामने बड़ा संकट था—अगर वह कुछ सोच-समझकर उपाय न करता, तो भूख से मर जाएगा।
एक दिन वह तालाब के किनारे उदास बैठा था। उसके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। तभी तालाब की मछलियों ने उससे पूछा—
“अरे बगुले भैया, आज तुम उदास क्यों बैठे हो? पहले तो हमेशा शिकार करते रहते थे, आज पानी में झाँक भी नहीं रहे?”
बगुले ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“भाइयो, अब क्या बताऊँ? मुझे तो तुम्हें देखकर दुख हो रहा है। पता नहीं, तुम सबका कल क्या होगा!”
मछलियाँ चौंकीं। “क्यों, ऐसा क्यों कह रहे हो?”
बगुले ने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया—
“मैंने सुना है कि इंसान इस तालाब को जल्द ही सुखाने वाले हैं। वे यहाँ खेती करेंगे। सोचो, जब पानी ही नहीं रहेगा, तो तुम सबका क्या होगा? यहाँ के मेंढक, कछुए, मछलियाँ—सब मर जाएँगे। यह सोचकर ही मेरा दिल भारी हो रहा है।”
यह सुनकर तालाब के जीव-जंतु घबरा गए। अफवाह का असर ऐसा हुआ कि सबके दिल में डर घर कर गया।
मछलियों ने काँपते हुए पूछा—
“तो अब हम क्या करें? कहाँ जाएँ? हमारा जीवन तो इसी तालाब में बसा है।”
बगुले ने अपनी चालाक मुस्कान दबाते हुए कहा—
“देखो, मैं तो तुम्हारा भला चाहता हूँ। पास ही एक बड़ा सा तालाब है। वहाँ पानी भी बहुत है और खाने-पीने की भी कोई कमी नहीं। अगर चाहो तो मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर वहाँ पहुँचा सकता हूँ। इस तरह तुम सब सुरक्षित रहोगे।”
उसकी मीठी बातों ने सबको भरोसा दिला दिया। जीव-जंतु डर के मारे वैसे ही परेशान थे, और बगुले ने उनके डर का फायदा उठाया।
पहली बार कुछ मछलियाँ बोलीं—
“अगर तुम हमें सच में वहाँ पहुँचा सकते हो तो हमें ले चलो। हमें अपनी जान बचानी है।”
बगुले ने मौका देखा और तुरंत हामी भर दी। उसने कहा—
“ठीक है, पर एक बार में मैं एक-दो को ही ले जा सकता हूँ। बाकी सब धीरे-धीरे पहुँच जाएँगे।”
अब बगुला हर रोज़ अपनी पीठ पर एक-दो मछलियाँ बिठाता, उड़कर पास के जंगल में जाता और उन्हें खा जाता। फिर लौटकर तालाब के किनारे बैठ जाता। वहाँ आकर मासूम चेहरा बनाकर कहता—
“तुम्हारी साथी मछलियाँ उस बड़े तालाब में मज़े से तैर रही हैं। वहाँ तो सच में स्वर्ग जैसा आनंद है।”
बेचारे तालाब के जीव उसकी बातों पर विश्वास कर लेते और बगुले के साथ जाने को तैयार हो जाते। बगुला इस तरह रोज़ अपनी भूख मिटाता रहा। उसका पेट फिर से भरने लगा, शरीर में ताक़त लौट आई और चेहरा चमकने लगा।
काफी दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। धीरे-धीरे तालाब की मछलियाँ कम होती गईं। मेंढकों की संख्या भी घटने लगी। लेकिन तालाब में रहने वाला एक समझदार केकड़ा यह सब देख रहा था।
उसने सोचा—
“यह कैसे हो सकता है कि सब यहाँ से जाएँ और वापस कभी मिलने भी न आएँ? अगर वाकई वे बड़े तालाब में मज़े कर रहे हैं, तो कोई न कोई तो लौटकर हमें बताने आता। ज़रूर इसमें कुछ गड़बड़ है।”
केकड़े ने बगुले के सामने जाकर कहा—
“बगुले भैया, सब तो नए तालाब में पहुँच गए। अब मेरी बारी है। मुझे भी वहाँ ले चलो।”
बगुला अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे लगा—
“अरे वाह! आज तो मज़ेदार खाना मिलेगा। केकड़े का माँस तो बड़ा स्वादिष्ट होता है।”
उसने कहा—
“चलो भाई, आज तुम्हें भी पहुँचा देता हूँ।”
बगुला उड़ान भरने लगा। लेकिन केकड़े ने इस बार सावधानी बरती। उसने अपने पंजों से बगुले की गर्दन मज़बूती से पकड़ ली। बगुले को यह अजीब तो लगा, पर उसने सोचा कि अभी तो शिकार उसके पंजों में फँसा ही है।
कुछ देर उड़ने के बाद केकड़े ने पूछा—
“अरे बगुले भैया, वह बड़ा तालाब कितनी दूर है?”
बगुला हँसते हुए बोला—
“कौन सा तालाब? अरे मूर्ख, अब तक जिन मछलियों को मैं यहाँ से ले गया हूँ, सबको यहीं पास के पत्थरों पर खा गया हूँ। तू भी मेरी चोंच से बच नहीं पाएगा।”
यह सुनते ही केकड़े ने अपने पंजों की पकड़ और मजबूत कर ली। उसने कहा—
“अच्छा, तो असली सच यह है! तूने सबको धोखा देकर मार डाला। अब तेरी बारी है।”
इतना कहते ही केकड़े ने अपने पंजों से बगुले की गर्दन कसकर दबा दी। बगुला तड़पने लगा, उसके पंख फड़फड़ाने लगे, पर बच न सका। कुछ ही पलों में उसकी जान चली गई।
केकड़ा अपनी चालाकी और बुद्धि से बच गया। उसने बगुले का सिर काटकर वापस तालाब में पहुँचा और सबको सच्चाई बताई।
तालाब के जीव-जंतुओं को तब जाकर असली बात पता चली। वे सब दुखी हुए कि कैसे लालच और डर के कारण उन्होंने बगुले की चाल में फँसकर अपनी जान गँवाई।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि डर और घबराहट में लिया गया फैसला अक्सर हमें मुसीबत में डाल देता है। हमें हर मीठी बात पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि धोखा और छल अक्सर मीठे शब्दों में छिपा होता है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि बुद्धि और विवेक हमेशा चालाकी और छल पर भारी पड़ते हैं। बगुला चाहे कितना भी चालाक क्यों न बना हो, लेकिन अंत में केकड़े की समझदारी और सूझबूझ ने उसकी सारी चालें बेकार कर दीं और उसका असली चेहरा सबके सामने ला दिया।
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ तालाब और बगुले की नहीं, बल्कि हमारे जीवन की भी सच्चाई है। कई बार लोग हमारी मुश्किलों और डर का फायदा उठाकर हमें छलने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में हमें धैर्य से सोचना चाहिए, सच्चाई को परखना चाहिए और विवेक से काम लेना चाहिए।
याद रखिए— “चालाकी कुछ समय के लिए जीत सकती है, लेकिन सच्ची बुद्धि और ईमानदारी हमेशा स्थायी जीत दिलाती है।
धन्यवाद
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