योगी क्यों फड़वाते हैँ अपना कान, क्या है कनफटा योगी की पहचान और कर्णभेदन की परंपरा9

    जानिये क्यों नाथ संप्रदाय के सभी योगियों के कान फटे होते हैँ. उनके लिए कर्णभेदन की परंपरा को अपनाना अनिवार्य हैं और उन्हें क्कनफटा योगी क्यों कहा जाता है.

    भारतीय योग परंपरा में कई संप्रदाय हुए, परंतु नाथ संप्रदाय की सबसे अलग पहचान है – कान फाड़कर विशेष मुद्रा धारण करना। इसी कारण इन साधुओं को ‘कनफटा योगी’ कहा जाता है। नाथ परंपरा के ग्रंथों में लिखा है कि मुद्रा धारण करना केवल एक आभूषण नहीं है, बल्कि साधक के लिए यह साक्षात् कल्याणदायिनी मुद्रा है। यह दीक्षा का संस्कार है, जिससे एक साधारण मनुष्य नाथ योगी बनता है।

    जब कोई शिष्य गुरु से दीक्षा लेता है, तो उसकी साधना यात्रा का सबसे पवित्र क्षण आता है – कर्णभेदन संस्कार। इस संस्कार में गुरु शिष्य के कानों को एक विशेष छुरी या शस्त्र से भेदते हैं। यह क्रिया साधारण कर्णभेदन नहीं, बल्कि संस्कार है – एक नई आध्यात्मिक जन्म की शुरुआत। कानों के उस छेद में धातु से बने कुण्डल पहनाए जाते हैं, जिन्हें मुद्रा कहा जाता है। यह मुद्रा न केवल बाहरी पहचान है, बल्कि यह योगी के भीतर संकल्प, संयम और साधना की निरंतर ज्योत जागए रखती है।

    नाथ परंपरा कहती है – “जो साधु कान फाड़कर मुद्रा धारण नहीं करता, उसका नाथ मार्ग में प्रवेश अधूरा है।” इसका अर्थ यह है कि कर्णभेदन केवल बाहरी रिवाज़ नहीं, बल्कि यह साधक के संकल्प का सार्वजनिक उद्घोष है। यह वह क्षण है जब शिष्य अपनी सांसारिक पहचान को पीछे छोड़कर गुरु परंपरा का अंग बनता है। यही कारण है कि नाथ योगियों की पहचान ही उनके कानों की मुद्रा है। लोग उन्हें देखते ही समझ जाते हैं – ‘ये हैं नाथ पंथ के साधु, ये हैं कनफटा योगी।’

    छुरी से कान भेदना क्यों आवश्यक है? क्योंकि यह प्रतीक है – पुराने जीवन का त्याग और नए जीवन का आरंभ। नाथ ग्रंथ बताते हैं कि कर्णभेदन साधक को स्थिर करता है, उसे गुरु से जोड़े रखता है। यह उसकी साधना का अनुशासन है। जैसे धागा मनके को एक सूत्र में पिरोता है, वैसे ही मुद्रा योगी को नाथ परंपरा से जोड़ देती है।

    कान फाड़ने की पीड़ा साधक को स्मरण कराती है – कि साधना का मार्ग आसान नहीं। जैसे शरीर को यह पीड़ा सहनी पड़ती है, वैसे ही मन को भी तप और संयम से गुजरना पड़ता है। मुद्रा कानों में लटकी रहती है, और हर क्षण योगी को यह याद दिलाती है – कि उसका जीवन अब केवल योग, भक्ति और सेवा के लिए समर्पित है।

    नाथ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि कर्णभेदन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जन्म है। यह वह क्षण है जब शिष्य सांसारिक मनुष्य से ऊपर उठकर योगी के रूप में नया जीवन धारण करता है।

    इस प्रकार नाथ संप्रदाय में कर्णभेदन और मुद्रा धारण करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि साधना का अनिवार्य संस्कार है। यह योगी की पहचान है, उसकी दीक्षा का प्रतीक है, और उसकी आंतरिक साधना का साक्ष्य भी। इसीलिए नाथ योगियों की गूँज आज भी सुनाई देती है – “अलख निरंजन!” और जब लोग उनके कानों की मुद्रा देखते हैं, तो समझ जाते हैं कि यह साधु उस अनंत परंपरा का हिस्सा है जो शिव से शुरू होकर आज तक योग की ज्योति को जगाये हुए है।”

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